Tuesday, December 31, 2013

Happy New Year!


"जब तेरी इनायत पे मेरी नज़र जाती है, 
मेरे मालिक! मेरी आँख भर भर आती है। 
तू दे रहा है मुझे इस कदर कि -
हाथ दुआ में उठाने से पहले ही,
झोली मेरी भर जाती है। "

नव वर्ष की दिल से शुभकामनाएँ !

Sunday, December 29, 2013

केजरीवाल -अर्जुन हैं -अभिमन्यु नहीं !

"डर केजरीवाल को भी लगा होगा?
नींद केजरीवाल कि भी उडी होगी?
सपने केजरीवाल के भी टूटे होंगे?
एक बार अपने बच्चों-बीवी को केजरीवाल ने भी देखा होगा ?
और सोचा होगा -
कहीं मैं गलत तो नहीं कर रहा हूँ ?
कहीं मैं -सब कुछ खो तो नहीं दूंगा कि मेरे बच्चे संघर्ष करें ?
क्यों कि -
लड़ाई -
भारत की एक बड़ी राजनैतिक पार्टी के नेतृत्व से थी !

पर.…
केजरीवाल को याद आया होगा -
महाभारत में अर्जुन का बेटा -अभिमन्यु!
जो-
ऐसे ही लोगों के बीच चक्रव्यूह में फंस गया था!
और -
मारा गया था।
लेकिन-
केजरीवाल को भरोसा था-
अपनी सोच पे।
अपने सपनों पे।
अपने पंखों पे।
और-
अपने अपनों पे।

और उस सीधे-साधे से सनकी टाइप के अक्खड़ इंसान ने -
बिना जीन्स-टी -शर्ट पहने-
बिना अपनी शर्ट को पैंट के अंदर खोंसे -
बिना महंगे मोबाइल से बात किये-
उखाड़ फैंक दी-
उस शीला की सरकार को जिसने -
सपने में भी नहीं सोचा था-
नियति की इस करवट को।

और केजरीवाल बन बैठे आदर्श उन युवा स्वप्नों के-
जो टाटा-अंबानी -बिरला नहीं है पर,
उनके पँखों -परवाज में उड़ने कि चाहत है।
और अपने स्वप्नों को साकार करने की जिजीविषा है।

एक आम आदमी ने दिखा दिया कि -
ज़िन्दगी में कुछ भी असम्भव नहीं है।
बस-
कुछ कर गुजरने की भूख होनी चाहिए।"

केजरीवाल ने दिखा दिया कि वह -
अभिमन्यु नहीं हैं जो जो चक्रव्यूह को भेद नहीं पाएँगे बल्कि वे
साबित करेंगे कि वे -
महाभारत के सुपात्र -अर्जुन है !"

केजरीवाल -अर्जुन हैं -अभिमन्यु नहीं !

इसी का नाम ज़िन्दगी है।

कैसे न जाने कैसे?
बीत गया वो वक़्त!
जब जीवन एक संगीत था!
मै किसी का गीत था!
और कोई मेरा मीत था!

हवा का बहना किसी को याद करने का पलके मूंद कर इक बहाना था !
पानी का बरसना किसी को किये वादों का निभाना था !
धूप का खिलना सपनों का सच होना था !
इंद्रधनुष का खिलना किसी का मेरे लिए संवरना था !
और.……
रात का आना सुबह का इंतज़ार होता था !

कैसे सारे मायने बदल गए।
कैसे सारे फलसफे बदल गए।
कैसे सारे ख्यालात बदल गए।
और-
सच मैं बदल गया।

बदलने चला था दुनियां को !
बदलने चला था प्रेम को-उसकी अगन को !
बदलने चला था अपनी लगन को!
और बदल गया मैं !

खैर कोई बात नहीं।
इसी का नाम ज़िन्दगी है।
जहाँ सिर्फ खुदा कि बन्दगी है।
और बाकी सब -सादगी है।




Thursday, December 12, 2013

लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

मुझे नहीं मालूम वो पथ-
और न है मेरे पास कोई ऐसा रथ -
जो ले चले मुझे-
तुम्हारे पास !
जहाँ है तुम्हारा निवास-
तुम्हारे विधायक बन जाने के बाद।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

बस-
मुझे यह मालूम है कि-
मैं गरीब था -
मैं गरीब हूँ-
और.…
गरीब रहूँगा।
 लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

कुछ दिनों के लिए बन गया था तुम्हारा खास।
तुम को मुझ से थी कुछ आस।
और अब जब पूरी हो गई है तुम्हारी वो आस-
अब तुम आ गए हो अपने असली लिबास।
बता दी है मुझे मेरी दो कोड़ी कि औकात।
और अब मैं !
तुम्हारा मतदाता!
तुम्हारा चार दिनों का भगवान् !
बन गया हूँ चलती फिरती लाश।
बदहवास ……
एक बार फिर तुम से ठगा हुआ-
तुम्हारा आम ओ खास !
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

बस,ऑटो,टेम्पो में चलता हूँ-चलता था ;
और
चलता रहूँगा।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

मालूम है ?
मुख्यमंत्री और कलेक्टर से भी बड़ी औकात -
मेरे गाँव के पटवारी और थानेदार कि है जो-
खिसका सकता है मेरी जमीन-
या फंसा सकता है मुझे कोई गांजा के फर्जी केस में-
मैं ऐसा मानता हूँ।
मानता था और
मानता रहूँगा।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!


मालूम है ?
मैं राशन की दुकान के सेल्स मैन को "अन्न दाता"
मानता हूँ।
कोई सरकार का मुलाजिम नहीं जो-
अपना कर्त्तव्य कर मुझे राशन-पानी दे रहा हो।
बस उसकी दया और सह्रदयता से ही-
मेरा और मेरे बच्चों का पेट पल रहा है।
इसी कारण मुझे हर बार उसे-
घूंस देनी पड़ती है और ख़ुशी ख़ुशी देता हूँ।
देता रहा हूँ और-
देता रहूँगा।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

मालूम है ?
चाइना मोबाइल मेरे पास भी है।
छः सौ रुपए में आया।
और मैं!
मैं तुम्हारा अमूल्य मतदाता!
उस मोबाइल फोन से बात कर के या उसे-
अपनी फटी जेब में रख कर-
बहुत खुश हूँ कि चलो-
यह सपना तो सच हुआ।
कम से कम चीनी मोबाइल तो -
अपना हुआ !
देसी मोबाइल न सही विदेशी मोबाइल तो अपना हुआ।
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

थक गए होगे ?
एक महीने "आयोग" ने बेफालतू में बहुत मेहनत करवाई!
पूरे क्षेत्र की झाड़ू लगाने में-
पांच किलो घट गया वजन और-
अब कुछ दिनों के लिए -
स्वास्थ्य पे ध्यान देना पड़ेगा !

मैंने भी तुम्हें देखा था!पूरे पांच साल बाद ?
हलकी सी उमर दिखने लगी है?
फिर अब उम्र भी तो बढ़ रही है?
एसी गाड़ी में बैठ कर,
मिनिरल वाटर पी के,
वाकई चुनाव में बहुत मेहनत पड़ गई।
खैर कोई बात नहीं -
जीत तुम्हारी हुई।
 लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

अलविदा !
फिर मिलेंगे !
पांच साल बाद !

अपना ध्यान रखना!
पांच साल बाद कहीं ऐसा न हो कि -
डाइबिटीज और हार्ट -अटैक के साथी हो जाओ और-
और हम शोक सभा करें कि-
बिचारे!
अच्छे आदमी थे!
भला नहीं किया तो-
किसी का बुरा भी नहीं किया !
फिर-
क्षेत्र में -
विकास कोन कराता है ???
लोकतंत्र ज़िंदाबाद!

Monday, December 2, 2013

ख़त !



"ऐ ख़त जा उनके हाथों को चूम ले 
जब वो पढ़ें तो -उनके होठों को चूम ले 
अगर वो फाड़ भी डालें  …। तो उनके क़दमों को चूम ले!"

Saturday, November 30, 2013

बीत रही है ज़िन्दगी मगर धीरे धीरे !

"दरख्तों के साए में बीतती जा रही है ज़िन्दगी !
बहुत होले होले से -बहुत धीरे-धीरे से !
आहिस्ता आहिस्ता मगर  …। 
प्यार से धीरे धीरे !

प्यार की  बारिश!
बिछडन की तपन !
वफाओं की सौगंध और -
हक़ीक़त ए ज़िन्दगी का सामना !
सब कुछ तो सीखा -झेला-
धीरे धीरे  .......

माँ -पापा का बिछड़ना लगा-
जैसे दरख़्त गिर गए हों!
भूचाल आ गया हो !
रात ने अमावस्या का रूप धर लिया हो !
और किसी लंगड़े की बैसाखी छिन गई हो !
सब कुछ तो सीखा -झेला!
धीरे धीरे  ……

बिन माँ -पापा के शादी-
बिन माँ-पापा के नौकरी-
'बिन माँ-पापा के पढाई-
और बिन माँ -पापा के जीवन की भरपाई-
सब कुछ तो हुआ -
धीरे धीरे  …… 

बच्चों का ज़िन्दगी में आना-
उनकी परवरिश -उनके सपने -उनके अपने-
उनके प्रश्न -उनके उत्तर और मै निरुत्तर?
सब कुछ हुआ-
धीरे धीरे  ……

अपनों का दूर जाना-धीरे धीरे..... 
उनका फोन न आना -धीरे धीरे  .......
दीपावली दशहरा होली घर न आना  ……।
ऊपर से इतराना  .......
सब कुछ तो हुआ-
धीरे धीरे  ……

लेकिन धीरे धीरे के बीच-
वो मेरे साथ थे-और हैं- जिसे -
मै भगवान! भी कहता हूँ तो कभी अपने प्यारे पापा!
जिन्होंने-
अपने "शानू" की "शान" को संभाला  और-
जिस "गर्व" से उन्होंने मेरा नाम "गौरव" रखा था!
उस "गरिमा" और "गर्व" को बनाये रखने का-
आशीर्वाद दिया-साथ दिया। 
ये सब भी हुआ -बिना माँ -पापा के हुआ
मगर धीरे धीरे।

हलकी सी आँखों में झुर्रियाँ,
हलकी सी बालों की सफेदी,
कभी कभी घबराहट होना-रात में खांसना ,
ज़ुखाम का एक दम से ठीक न होना-कफ़ से दोस्ती ,
और शक्कर का कम खाना,
ये भी हो रहा है -
मगर धीरे धीरे  …।

अब गाड़ी संभल कर धीमा चलाना
किसी के गाड़ी उट -पटांग चलाने पे लड़ाई न लड़ना
फिजूलखर्ची न करना
किसी के सुख -दुःख में जरूर जाना और  ....
रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों पे "हॉर्न "बजाना -
सब कुछ करने लगा हूँ -
मगर धीरे धीरे  ....... 

गाय को रोटी डालना,
चीटीं को शक्कर खिलाना,
चिड़ियों को दाना डालना,
कुत्तों को रोटी डालना।
ये भी करने लगा हूँ मगर -
धीरे धीरे  …… 

शायद वो सब कर रहा हूँ धीरे धीरे-
जो कभी प्यारे पापा ने किया होगा -धीरे धीरे  …।
क्या करूँ अब समझ में आने लगा है -
जीवन का सत्य मगर-
धीरे धीरे !"








Monday, November 25, 2013

दुआ!






"न जाने किसकी दुआ मेरे सजदे पे कबूल हो रही है! 
डूबता भी हूँ तो समुंदर उछाल देता है!"




मतदान!


और वो उजला दिन भी पूरा हुआ-
जब कुछ सिर्फ चुनी हुई चंद तक़दीरों के ख्वाब-
मत पेटियों में बंद हो गए।

और.....
लाखों-करोड़ों वोट डालने वाले जिंदादिल और बुजदिलों के  ख्वाब-
चुनाव जीतने वालों की किस्मत की लकीरों-
में फ़ना हो गए। 

कितनी ख़ुशी के वो दिन थे-
जब तुम अपनी औकात से-
हमारी देहलीज पे आते थे।
हाथ जोड़ कर वोट मांगते थे -
और..... 
उन चंद लम्हों के लिए ही सही-
हम भी विधायक बन जाते थे।

चलो यही सही -इस ज़िन्दगी में -
कुछ दिनों के लिए -तुम अपनी असली नस्ल और रूप में हमारे सामने अवतरित तो हुए। 
ऐसा लगा कि वाकई तुम तो आदमी हो!
सजीव,चिंतित,विचलित,मानवीय और मधुर।
पर.…।
काश तुम हमेशा ऐसे हे रहते ???
पर.…।
अब कहाँ देखने को या दीदार करने को मिलेगा तुम्हारा यह मनभावन रूप ?
किसी ने सही ही कहा है  कि -
"मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं
अब तुम हमें जानते नहीं। "

पर चलो अपना ध्यान रखना -
गरीबों और मजलूमों को कभी सताना मत।
वरना -
कहीं ऐसा न हो जाये कि -
नेताजी अपनी गाड़ी से जा रहे थे ;पता नहीं क्या हुआ कि गाड़ी "डिवाइडर" पे चढ़ गई-
ड्राईवर तो बच गया पर नेताजी की रीढ़ की हड्डी खिसक गई।
और..... 
अब नेताजी अपना शेष जीवन-
लेटे लेटे ही गुजारेंगे।
बिचारे बड़े ही अच्छे आदमी थे।

क्या करें -
"खुद कि लाठी चलती है तो
आवाज नहीं करती !"

आमीन !
शब्बा खैर !

Saturday, November 23, 2013

धन्यवाद नेताओं !धन्यवाद दिल से!

धन्यवाद नेताओं !धन्यवाद दिल से!


 आप सभी हमारे आँगन में आये-


हमारी सड़कों पे चले.…
हमारी कुलियों में थूकें-
हम आभारी हैं !

हमारे सामने हाथ जोड़े-
हमारे सामने नजरें झुकाई-
जुबां लड़खड़ाईं-
हम आभारी हैं !

महँगी महँगी गाड़ियाँ दिखाई-
ऊँचे ऊँचे सपने दिखाए-
प्यारे प्यारे जादू के झप्पे दिखाए
और.…।
महंगे महंगे जूतों के मॉडल दिखाए-
सच
हम आभारी हैं !

बस थोड़ी सांस लेने में दिक्कत है!
सांस उखड़ने लगी है -
ऐसा नहीं है कि -डाक्टर को नहीं दिखाया?
डाक्टर कहते है -
पिछले एक महीने से लगातार बाहरी लोगों के आने से और हमारी हवा में सांस लेने से-
हवा में प्रदूषण ज्यादा हो गया है!
जो चुनाव बाद-
प्राकृतिक तरीके से -
इन प्रदूषण तत्वों के पांच साल के लिए वापस चले जाने से-
नॉर्मल हो जाएगा।

थोडा बहुत हमारे गावों में -
गऊ माता भी परेशान रही -वो भी -आपकी महंगी गाड़ियों कि आवाजों से-
कुत्ते परेशान रहे -पहियों के नीचे दबने से-
और.…।
पशु -पक्षी परेशान रहे
आपके आगमन से।
पर आप चिंता मत करना-
जानवर हैं !
मरते है -कोई बात नहीं !

आप चिंता मत करना।
जीत पक्की है।
पूरा मामला "फिट" हो गया है।
जीत "शियोर" है !

फिर मिलेंगे !
पांच साल बाद !
तब तक के लिए -
शब्बा खैर !
राम राम !


Saturday, November 9, 2013

मै पतंग हूँ !


कटी पतंग कभी देखी है ?
कटने के बाद.……
बस उड़ती हुई.……
बिना रुके-बिना थमे.…
बस नीचे की  ओर...... 
गिरती जाती है।

कोई छत उसकी नहीं होती।
कोई मुडेर उसे नहीं थामती।

बस गिरना उसकी नियति होती है।
बस गिरना उसकी प्रतीति होती है।

इस छत से उस छत.… 
इस घर से उस घर...... 
इस दिशा से उस दिशा  ..... 
इस डगर से उस डगर  .......
बस-
गिरना और गिरना  .... 
नीचे और नीचे  …… 
पतित और पतित  ....
पतन और पतन  …… 

हजारों हाथ नीचे  …
उस गिरती हुई पतंग को-
लूटने के लिए।
नोंचने के लिए।
भोगने के लिए।

कोई नहीं उस पतंग को -
थामने के लिए।
सहेजने के लिए।
संजोने के लिए।

बस…
क्यों की तुम कटी हो तुम्हें -गिरना है।
क्यों की तुम फटी हो तुम्हें -गिरना है।
क्यों कि तुम हठी हो तुम्हें गिरना है।

पर  …… 
ऐ समय के काल चक्र!
मेरे वजूद पे शक न कर !

मै पतंग हूँ !
गिरने के बाद फिर उठना भी मेरी फितरत है। 
बहती हवाओं के विपरीत उड़ना और उठना मेरी सीरत है। 
आकाश में विचरना मेरी शोहरत है। 








Friday, November 8, 2013

पापा ! काश आप होते!




मेरे प्यारे पापा !
शानू के दुलारे पापा !

आज आपकी पुण्य तिथि है-

समाज में सबके लिये -ये पुण्य तिथि होगी  पर
मेरे लिए तो दुःख कि वो तिथि है
जो हमेशा मेरे जेहन में एक प्रश्न पैदा करती है कि -
आखिर क्यूँ ?
इतनी जल्दी क्यों ?
क्यों आप चले गए इतनी जल्दी-इस जहाँ से ?
जबकि आप रुक सकते थे  .......
यदि ईश्वर चाहता !

आपका जाना मेरे लिए था और आज भी है-

  • इक ममतामयी पिता का चला जाना। 
  • इक बरगद के पेड़ का असमय कट जाना। 
  • इक नौका का असमय भंवर में फंस जाना। 

और   ………

  • एक बसंती पौधे का रेगिस्तान में पहुँच जाना। 
आपके जाने  के अट्ठारह साल बाद भी  आज भी आप प्रासंगिक हैं-
  • सुबह कि पूजा में। 
  • सुबह के पुराने 'ब्लैक एंड वाइट ' गानों में। 
  • सुबह के जीवन संकल्पों में। 
  • घर में बनी उरद कि दाल में। 
  • सर्दियों में सुबह के भटे-मटर के भरते में। 
  • आलू के पराठों में। 
  • मेरी मोटर साइकिल ड्राइविंग टिप्स में। 
  • घर कि मंगोड़ियों में। 
  • घर कि सफाई में। 
  • पुरानी अलमारी में। 
  • पुराने बक्सों में। 
  • माउथोर्गन के सुरों में।  
और मेरी कलम में ,मेरी उँगलियों में। 

मुझे मालूम है कि -आप - 
  • मेरे जज्बातों में हो। 
  • मेरे सपनों में हो।  
  • मेरे भगवन में हो। 
पापा आप "मेरे" नहीं "अपने" घर के कण कण में हो। 
  • मेरी रग -रग में हो। 
  • अपने पोते -पोती कि नस-नस में हो और-
  • बहू की आस्था में हो ,कामना में हो प्रार्थना में हो।  
बस और क्या कहूं ?क्या लिखूं ?क्या सोचूँ ?
काश आप होते !
काश आप होते !
काश आप होते!



Wednesday, October 23, 2013

ठोकर!

"ठोकर खा के अब समझ में आया 
वो सही थे जिन्होंने कहा था -
मत लिख मोहब्बत की दास्ताँ 
देखना 
एक दिन ये अधूरी रहेगी। "
और मुँह चिढ़ा कर 
तुझ से कहेगी -
मजा आया ?
"

Monday, October 21, 2013

काश!

"अजब रंगों में गुजरी है ज़िन्दगी अपनी! 
दिलों पे राज किया-
लेकिन……  
मोहब्बत से महरूम रहे। "



तारीफ


"उनको चाहा तो मोहब्बत की समझ आई वरना 
इस लफ्ज की तारीफ ही सुना करते थे !"



नफरत!


"इक नफरत ही है-
जिसे दुनियां चंद लम्हों में जान लेती है वरना  ……  
चाहत का यकीन दिलाने में तो -
ज़िन्दगी ही बीत जाती है !"



Tuesday, October 8, 2013

इश्क!

"कैसे लोग बिता देते है 
एक जिन्दगी किसी के नाम पे 
हमने तो कई ज़िन्दगियाँ बिता दीं 
किसी के नाम पे। "



सबक!

"हमने अपनी जिन्दगी को आसान कर लिया-
किसी से माफी मांग ली
और 
किसी को माफ कर दिया। " 

Saturday, September 21, 2013

श्रद्धा और श्राद्ध






पापा प्यारे पापा ! 
आज आपकी नातिन/पोती ने
अपने आँसू निकाले
आपकी याद में
ये कहते हुए कि -
माँ !सबके दादा जी हैं फिर मेरे क्यों नहीं ?

उसकी माँ ने उसे फुसलाया और कहा कि -बेटा !
तुम्हारे दादा जी तुम्हें बहुत चाहते थे और कहते थे कि-
शानू !हाथ न लगा लेना मेरी बेटी में-
इस घर की लाडो है !
लड़कियां किस्मत वालों को मिलती है!
और वो हम है जहाँ इतनी प्यारी ईशा आई है।

वो बोली कि-माँ दादाजी का प्यार कैसा था ?
वो कैसे थे ?
उनका प्यार कैसा था ?
मेरे लिए गुड़िया लाते न ?
मुझे घुमाने ले जाते न ?
मुझे परी ड्रेस लाते न ?

न जाने कितने सवाल-
कुछ बेतुके कुछ अटपटे!
कुछ मासूम कुछ अपने !

आज जब आपकी तिथि है-
मैं आपको स्मरण कर श्रद्धा और श्राद्ध से आहुति देता हूँ-
तब आपकी यही पोती-
अपने नन्हें नन्हे हाथों से-
प्यारी सी रुई की बाती बना के-
अपने दादा जी की फोटो के सामने-
दीया और बाती के सहारे अपना प्यार अपनी श्रद्धा-
अपने दादा जी तक पहुंचा रही थी।

बस.………।
अब यही इच्छा है कि
आपकी इन दोनों अमानतों को
जीवन में सही मुकाम दिलवा सकूँ
जिससे ……
आपके स्वप्नों को साकार रूप दे सकूं !

Wednesday, September 4, 2013

मेरे शिवराज मेरे शिवराज !

"बहुत छोटी है हमारी औकात।
बहुत औछी है बात ।
बहुत हलके है हमारे जज्बात।
और......
बहुत अदने हैं हमारे स्वप्न ओ खास।
मेरे शिवराज मेरे शिवराज !

बस तुमसे है आस!
बस तुमसे है आस!
क्यों की तुम हो हमारी -आस!
तुम पे है विश्वास!
क्यों की-
तुम हो हमारे आम ओ खास!
इसी लिए निकालते है-
तुमसे अपनी भड़ास!
ओ म.प्र. के सरताज!
शिवराज शिवराज! 

टूट गई है चश्मे की डोर,
टूट गए हैं दांत,
और अब खाँसी भी बहुत आती है।
उदासी सितम धाती है।
बिछड़े जीवन साथी की याद आँख में पानी भर लाती है।
फिर अब हम भी कितने दिन के साथी हैं?
औलादों ने भी छोड़ दिया है साथ,
पेंशन लेने में कोई नहीं सुनता बूढ़े की बात,
देख रहें है उप्पर वाले की तरफ और हेरे हैं अपनी बाट।
हमें विश्वास है कि -अब तुम ही बचाओगे हमारे बुढ़ापे की लाज ?
मेरे शिवराज !मेरे शिवराज !


गिरा दो अपनी गाज!
उठा लो अपना गांडीव!
खोल दो अपना तीसरा नेत्र !
और उठा कर कर दो शंख नाद!
जिससे ख़त्म हो जाये -ये उन्माद!
और-
आ जाये हमारी ज़िन्दगी में भी थोड़ी सा स्वाद!
मेरे शिवराज मेरे शिवराज !

मै हूँ -बेआवाज!
मै हूँ बेस्वाद!
ठस!बुन्देलखंडी निपट गंवार सिर्फ बकवास!
और पहने हूँ फटा लिबास!
कोई नहीं मेरा खास!
मै किसी का नहीं खास !
किसी से नहीं अब आस
बस तुम पे है विश्वास
मेरे शिवराज मेरे शिवराज!

मुझे पता है कि तुम जरूर सुनोगे! मेरी आवाज!!!
मेरे शिवराज मेरे शिवराज!

ठीक कर दो सड़कों को!
शुरू कर दो विश्वविध्यालय का ख्वाब!
दे दो कोई कोई ऐसी सौगात जिससे-
यहाँ भी बन जाए AIIMS जैसा अस्पताल!
हे शिवराज !
बन जाओ हमारी ढाल!
मेरे शिवराज! मेरे शिवराज! 
तुम जरूर सुनोगे हमारे हाल!
हम बेहाल !
ठीक कर दो हमारा हाल
माटी के प्यारे नौनिहाल
मेरे शिवराज मेरे शिवराज ! !'

हनुमान जी को  नारियल चढ़ा कर
विंध्यवासिनी को ज्योति जल कर
और
कमरिया वाले बाबा को चादर चढ़ा कर
मागूंगा तुम्हारे लिए कुछ खास
अपना थूंक गुटक के ,आँसूं पोंछ कर और हाथ जोड़ कर उस ऊपर वाले से फिर मागेंगे तुम्हारा साथ
मेरे शिवराज !मेरे शिवराज!

बुजुर्ग कहते है कि "हमार बिटवा आवत रहो पर नेतन ने बरगला दवो !"

                 
                                     
                              

  बुजुर्ग कहत है कि "हमार बिटवा आवत रहो पर नेतन ने बरगला दवो !"

                    शिवराज काश आप आते तो हम कुछ बताते ?

लवकुश नगर !
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लवकुश नगर नहीं आने की खबर से न सिर्फ भाजपाई नेताओं के चेहरे मायूस हो गए है बल्कि आम जन मानस भी दुखी है की शायद वो आते तो कुछ दे कर जाते वरना क्या है ज़िन्दगी तो कट ही  रही है ?वहीँ कांग्रेसी नेताओं के चेहरे खिल गए है की चलो भाजपा ने सोचा की यह विधान सभा सीट तो पहले से ही विरोधियों के पास है और बेकार की मगजमारी से क्या फ़ायदा जब राजनगर सीट से नातीराजा का जीतना संभावित है। यदि रोड सही होती तो शायद शिवराज यहाँ आ ही जाते परन्तु उड़नखटोले से इस ग्रेनाइट कसबे में शायद ही वह उतरें। पेशों में बल तो उनके भी पड़ गए है जो इस सीट से भाजपा से प्रबल दावेदार है। वो क्या जवाब देंगे जनता को कि शिवराज क्यों नहीं आये ?बुजुर्ग कहते है कि "हमार बिटवा आवत रहो पर नेतन ने बरगला दवो !"

गुरुजन -उनके चरणों की रज को प्रणाम!






उनके चरणों की  रज को प्रणाम-
जिन्होंने-
एक फ़ैली हुई बिथरी मिट्टी को सुन्दर घड़े का आकर दिया,
बहते हुए पानी को बाँध का आकर दिया,
बंद स्याही को विचारों का समग्र रूप दिया-
और-
जीवन को सार्थक बनाया।

मै क्या था ???
एक पानी का बुलबुला जो नहीं जानता था -अपनी ताक़त ?
एक फूला हुआ गुब्बारा जो नहीं जानता था- अपनी उड़ान और उड़ने की दिशा ?
एक उनीदीं आखों का दुरूह स्वप्न जो नहीं जनता था-हकीकत की मेहनत ?
पर.………

जैसे अहिल्या को भगवान राम ने छू कर' तार' कर अभिशाप से मुक्त किया था.
वैसे ही-
मेरे पूज्य गुरुजनों ने.………
हम सभी को तार के.…………….
दिशा और दीक्षा दे कर.…………. बांध लिया है
जन्मों जन्मों के उस अटूट रिश्तों में-
जहाँ आप हमेशा हमारे "द्रोणाचार्य" रहेंगे और
हम आपके "सब्यसाची" "अर्जुन" रहेंगे। "


Monday, August 26, 2013

"मुगलेआजम" आप जीत गए।

"मुगलेआजम" आप जीत गए।
बहुत बहुत बधाई।

कल कितनी चमक थी,
आपकी आँखों में  …………।
बिलकुल कुछ कुछ-
'दुर्गा शक्ति' को आपके द्वारा हराने के बाद  …।
कुछ ऐसे ही चमक थी आपकी 'आँखों' में।

कल टीवी पे ऐसा लग रहा था-
जैसे आपने सारा संसार जीत लिया हो!
या फिर -
सारे संसार के लोगों की आपने अपनी ऊँगली पे धरती थाम  के रक्षा कर ली हो !
या फिर -
"बाबर" फिर से विश्व विजेता बन गया हो।  
या फिर-
"दुर्गा शक्ति" की नौकरी छिन गई हो।
सच -
"सत्य" में बहुत "शक्ति" होती है और.…. 
आपने यह कर दिखाया।

कभी कभी तो यह लगता है की -
यदि आप पाकिस्तान में होते तो-
"सदर" ए पाकिस्तान होते !
और अफ़ग़ानिस्तान में होते तो-
वहां के राष्ट्रपति की तो छुट्टी ही समझो !
पर.…
उत्तर प्रदेश में ???

खैर वाकई तारीफ की बात है -
अपने कल उत्तरप्रदेश को थामा,
सरयू नदी को लहू लुहान होने  बचाया,
धर्म को निर्पेच्छ रखा,
और सच.…
अपना सब कुछ निछावर कर दिया।

सच! अगर आप जैसे कुछ और नेता हो जाये तो-
वाकई-अगले चुनाव में -
केंद्र में आपकी सरकार पक्की समझो।
और.………….
फिर तो सारे देश में ?
अपनी  धरम निर्पेछता की घुट्टी  ???

आमीन आमीन आमीन !

Tuesday, August 20, 2013

वफ़ा!!



ज़िन्दगी को जान लेने के बाद कह सकता हूँ कि -

"टूटे हुए प्यार में भी
वफ़ा होती है।

अब कभी न मिलने की वफ़ा ।
अब कभी याद न करने की वफ़ा ।
अब कभी उस गली-ओ-शहर से न गुजरने की वफ़ा जहाँ "तेरा" ठिकाना था ।

चिट्ठियों को जला के राख कर देने की वफ़ा।
यादों को आँखों के फलक से मिटा देने की वफ़ा।
और वादों को झुठला देने की वफ़ा।

कभी अकस्मात मिल जाने पे "अजनबी " बन जाने की वफ़ा।
कभी अकेले में मिल जाने पे "हदें" न लांघते हुए मुस्करा के निकल जाने की वफ़ा।
और बस मन ही मन में भगवान के सामने "इक-दुसरे" की सलामती की दुआ मांगने की वफ़ा ।

सच.…………………
"वफ़ा" प्यार पाने में भी है।
वफ़ा प्यार खोने में भी है।

"प्यार" पाने में पूरे जन्म भर पूरी "शिद्दत" से  प्यार निभाने की वफ़ा!
और.…………….
"प्यार" खोने के बाद-
पूरे जन्म भर पूरी "शिद्दत" से अपने "प्यार" को अपना "राज" बना के सीने में दफ़न करने की वफ़ा!
और.………………….
अगले जन्म फिर मिलने की दुआ करने की वफ़ा। "


Monday, August 19, 2013

इक जमाना था जब!

इक जमाना था जब-


तेरी चुनरी तेरे रुमाल और तेरी चिट्ठियो को रखता था अपनी जान से भी ज्यादा संभाल के।

इक जमाना था जब-
तेरे दाँतों से काटी प्याज का इक टुकड़ा झूठा खाने का अपना मजा था।

एक जमाना था जब-
तेरे ख़त तेरे ग्रीटिंग कार्ड और फोटो जब बिस्तर पे साथ सोते थे तो लगता था ज़िन्दगी सँवर गई।

एक जमाना था जब-
तेरी फोटो तेरे नाम पे सिन्दूर लगाया था तो ऐसा लगा था जैसे तू मिल गई।

एक जमाना था जब-
तेरे शहर से निकलता था तो लगता था जैसे जिंदगी की हद मिल गई।

एक जमाना था जब-
पहली बार तेरी गिरती हुई चुन्नी को हक से उठा के डाल दिया था तेरे कांधों पे और आँख पे बार बार आती जुल्फों को संवार दिया था पीछे की ओर -
तो लगा था जैसे नब्ज थम गई।

पर.…………………………….
अब न वो जमाना है।
न वो फ़साना है।
न वो दीवाना है।
बस.………
कह-कहा लगाना है।
छटपटा के बताना है।

'प्रेम' सिर्फ 'ज़िन्दगी' गंवाना है।
'कसमे-वादे' का 'फलसफा' पुराना है।
'नजदीकियाँ' तो सिर्फ 'इक' बहाना है।  



Thursday, August 15, 2013

एक शाम शहीदों के नाम -

एक शाम शहीदों के नाम -


सुनने में अच्छा लगता है
बोलने में अच्छा लगता है
और.…….
एहसास करने में -सुकून देता है कि -
चलो हमने अपना कर्तव्य निभाया और
दे दी अपनी श्रृद्धांजलि उन लोगों को
जिन्होंने कभी किसी ज़माने में
६७ साल पहले  ……
इस देश के लिए कुछ किया था।

असल में हम भूल गए हैं -उन  "कुछ लोगों की शहादत  " को !
और कहते -सोचते है कि -
ऐसा क्या किया था -उन लोगों ने ?जो हम उन्हें हर साल याद करें ?
ऐसा क्या दिया था उन लोगों ने ?जो हम उनका गुणगान करें ?
उनका तो यह कर्तव्य था -तो किया?
कोन सा बड़ा काम किया ?
हम होते तो हम भी करते ?

असल में हम बहुत अहसान फरामोश हो गए है -
देश के शहीदों की तो बात ६७ साल पुरानी हो गई  -
हम तो अपने पिता से भी कहने से नहीं चूकते कि -
आपने किया क्या है?
पैदा कर दिया तो -कोन सा बड़ा काम किया ?
पाला-पोसा  और पढाया?
वो तो आपका फ़र्ज़ था?
वरना  ……. क्या है?
ज़िन्दगी तो सभी जीते है ?
हम भी जी लेते !

वास्तव में  हम  नहीं जानते है कि -

  • देश के लिए "प्राणों" की आहुति देना क्या चीज होती है?
  • गोरों की गोली छाती पे खाना क्या होता था ?
  • अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना कितना बड़ा जुर्म होता था ?



और  …….

  • अपने सपनों को अपने देश के हित के लिए खंडित कर चूर -चूर कर देना क्या होता था ?


और  हमने बिसरा दिया है कि  -

  • सन ४७ में उन विधवाएँ को जिनमे  इक-चौथाई  से अधिक ने अपने पतियों को अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हुए खोया था। 
  • कि -उनकी चूड़ियों के टूटने पे भी क्रंदन होता था,सपने टूटते थे  और पिता बिछड़ते थे ?

और -

  • आंसूं उनके भी नहीं रुकते थे -वो भी इंसान थे -उनके भी जज्बात थे -उनकी भी आरजू होती थी -और उनके भी हमारी तरह दिल था -दिमाग था। 

पर। ……
अपने देश के खातिर -
उस समय की विधवाओं ने-

  •  चुडिओं को कांच समझा। 
  • पुत्रों ने पिता को शहीद समझा।
  • बहनों ने अपनी राखियों को समेट कर  अपनी मुट्ठियो में भींच लिया।
और

  • युवाओं ने अपने सपनों को -आज़ादी समझा !
आपको अहसास है कि -
युवा दिल उस समय भी धड़कते थे।  
युवा मन के सपने उस समय भी परवाज उड़ते थे।  
प्रेम के अंकुर उस समय भी फूटते थे। 
और.................. 

  • उस समय की वफाओं का जज्बा आज की वफाओं से कहीं बेहतर होता था!
  • उस समय की मोहब्बत रूहानी ताक़त होती थी -आज की युवा सोहबत नहीं!
और
  •  उस दौर के "सात फेरे" -'सात जन्मों' का 'बंधन' होता था -आज जैसा 'सात सालों' का 'मनमौजी' रिश्ता नहीं !
पर.……. 
मित्रों !उस दौर के अनाम लोगों ने 
अपने सारे सपने,सारी कसमें,सारे वादे,सारे बंधन निछावर कर दिए -
उस देश की आज़ादी के खातिर जिसे हम आज -"इंडिया" या "हिन्दोस्तां" कहते है !
आओ नमन करें उन्हें  ........ 
जिनके प्रयास से हम आज सांस ले रहें है-आजादी की। 

हे मेरे बिछड़े स्वतंत्रता सेनानियों!
चरणपादुका (सिंघपुर) के बलिदानियों!
शत शत नमन। 
शत शत नमन। 
नमन उस त्याग को। 
नमन उस बलिदान को।  




Sunday, June 16, 2013

यादें अपने पापा की !


जब आपने साथ छोड़ा था-
जब आपने हाँथ छोड़ा था- 
मै थोडा घबराया था कि .....
बिन पापा कैसे चलूँगा ...
ज़िन्दगी के लम्बे फासले???

कैसे लूँगा फैसले ?
और ....
कैसे कटेगी ज़िन्दगी बिन पापा के?

पर आपके होसले ने- 
आपके सिखाए हुए पाठों ने- 
आपकी बातों ने- 
और आपके पित्रतत्व की छावं से -
पार कर आया हूँ ......
वह सारे धूल -धूसरित जीवन के आपा -धापी के पहाड़ 
और ......
आज आपसे कह सकता हूँ कि ....
पापा !मेरे प्यारे पापा!
आपका शानू और उसका परिवार- 
आपके आशीर्वाद और स्नेह से-
सुख -समृधि की और अग्रसर है!

आपके नाती-और नातिन आज भी तलाशते हैं-
अपने दादाजी को- 
उन दीवारों में ....
जहाँ आज आप फोटो फ्रेम में याद बन के टंगे हुए हो!

पूंछते हैं अनगिनित प्रश्न -आपके बारे में?
तलाशते है आपके प्यार-स्नेह को ....
हाथ फेरते है -आपके कपड़ों पे ....
और मजबूर करते है हमें -
आपके बारे में कुछ -
कहानियां सुनाने को!

दादा जी कैसे थे?
मम्मी अपने देखा है हमारे दादाजी को ?
आज होते तो हमे घुमाने ले जाते न ?
हमे बहुत प्यार करते न ?
कुछ ऐसे प्रश्न है -जिनका जवाब हमेशा एक ही होता है!

मालूम है पापा!
बहुत से लोग आपके नाती में आपकी "छबि" तलाशते है ?
कहते है -
ईशु बिलकुल अपने दादा जी पे गया है !

कुछ लोग तो कहते है की-
आप ईशु बन कर फिर अपने शानू के पास आ गए है !
क्यों कि -
आपको पता था और चिंता थी कि -
आपका शानू आपके जाने के बाद -
किसके साथ सोएगा ?

कभी कभी तो ईशु को जब डांटता हूँ तो कोई अनजानी ताक़त रोक देती है मुझे ...
और मुझे लगता है कि ..
काश कोई ऐसी ताक़त होती जो बताती कि .....
आप कहाँ हो ?
किस जहाँ में हो ?
या फिर ....
मेरे बेटे बन ....
मेरे आसमा में हो ???

आपके नाती को भी अहसास है की ...
हम दोनों बाप-बेटे का कोई रिश्ता है जो अजीब है ....
तभी जब हम दोनों प्यार करते है तो ...
बरबस मुख से निकल पड़ता है कि -

हम दोनों का जन्म जन्म का रिश्ता है -
पिछले जन्म में तुम मेरे पापा थे ....
और इस जन्म में -मै तुम्हारा पापा 
पर ....
चिंता मत करो ...
अगले जनम में हिसाब बराबर कर लेना ....
जब फिर तुम दुबारा मेरे पापा बनोगे???

इन जन्मों के फेर को कोन  समझाएगा पापाजी ?

काश आप होते और ....
कंधे पे हाथ रख ...
इस सत्य का भी पर्दाफाश कर देते!
काश आप होते....
काश आप होते .....




Sunday, June 2, 2013

दो दुर्दांत-नक्सलवाद और नस्लवाद!

"रावण  भी अट्टहास कर रहा था 
जब…
मेघनाथ ने लक्ष्मण को युद्ध भूमि में मूर्छित किया था।

दुर्योधन ने भी कहकहा लगाया था
जब….
द्रोपदी का दुशाशन ने चीर हरण किया था।

"चाऊ ऍन लाई " मुस्काए थे
जब….
सन 1962 में हमारी धरती को कब्जाने आये थे।

लिट्टे ने भी "चियर्स" कर जाम टकराए थे
जब…
भोले राजीव गाँधी के परखच्चे उडाये थे।

और ........
इंदिरा के हत्यारे भी खिलखिलाए थे-
जब उन्हें मार आये थे।

पर फिर क्या हुआ???
इतिहास गवाह है-

रावण का अंत हुआ।
दुर्योधन शांत हुआ।
चीन  के मनसूबे ध्वस्त हुए -देश का विकास हुआ।
और ....
इंदिरा -राजीव की जगह सोनिया -राहुल ने ली।

आगे इसी कड़ी में-
नक्सलवाद भी जुड़ जायेगा।

मानव अधिकारों के इक दिन के 'हीरो-हेरोइने' चाहे जितने तर्क दे ले-
भावी मानवता के लिए उनके मनसूबे हमेशा कुतर्क ही रहेंगे-देख लेना।

असल में-
कांग्रेस-भाजपा से परे भी एक दुनिया है-
जहाँ .......
कोई प्रवक्ता नहीं है या कोई मानव अधिकारों का पैरोकार नहीं है।

उस जहान की उस अदालत में-
देख लेना-
हिसाब होगा-
एक एक हिसाब होगा-
और। .....
नस्लवाद का छोटा भाई -नक्सलवाद-
अपने बड़े भाई की तरह-हारेगा।
देख लेना ........
इतिहास में .......
नक्सलवाद भी वहीँ दर्ज होगा-
जहाँ आज नस्लवाद है।"



 

Monday, May 13, 2013

जिम्मेदार बाप!

"कितनी जल्दी बदल जाता है समय?
कल तक -जी भाईसाब जी भाईसाब की रट लगाने वाले टट्टू
आज समझाते है कि-ज्वार -भाटा क्या होता है?

थोडा सा पैसा क्या कमा लिया
आज सूरज को आइना दिखाने लगे है।
कहते है-भाईसा!हमने पैसा बड़ी मुश्किलों से कमाया और जोड़ा है !
अक्ल लगनी पड़ी है-सो अलग!

वैसे तो हम बेईमान नहीं है और न कभी होंगे?
वो तो बस इन छोटे छोटे बच्चों के खातिर ये सब करना पड़ा?

नेताओं से लड़े,पुलिस से बचे और दलालों से भिड़े तब कहीं जाकर
यह दिन आया है कि -अपनी भी कोठी है!

कहते है कि-चलो कम से कम इतना तो कर ही दिया कि-
आगे आने वालीं पीड़ियाँ ये न कहेंगी कि-
मेरे बाप ने कुछ नहीं किया ......

शुक्र है कि-कितने जिम्मेदार बाप है ये सब .........
काश ऐ खुदा तू  मुझे भी इतनी ताक़त देता कि ....
मै भी इतना जिम्मेदार बाप कहला सकता।
काश !काश!काश!"

Saturday, May 11, 2013

बदलते हुए हिंदुस्तान को देख रहा हूँ-




बदलते हुए हिंदुस्तान को देख रहा हूँ-

देख रहा हूँ!


  • अटल जी को कुछ न बोलते हुए।
  • अटल जी के बारे में कुछ न सुनते हुए 
  • और इक ध्रुव तारे को अस्ताचल की और विचरण करते हुए।
देख रहा हूँ:
  • मोदी को बोलते हुए।
  • जनता द्वारा मोदी को तौलते हुए। 
  • और मोदी को खौलते हुए।
देख रहा हूँ:
  • रविशंकर प्रसाद के सधे हुए अन्दर तक झंझकोरते हुए वक्तव्यों को। 
  • दिग्विजय सिंह जी के मुस्कराते सधे शब्दों को।
  • और किरीट सोमैया की  औचक पोल खोल को।
समझ रहा हूँ :
  • केंद्र सरकार के मंत्रियों के इस्तीफे को। 
  • मनमोहन के असमंजस को। 
  • और कांग्रेस की हथेली से सत्ता की फिसलती हुई रेत को।
ढूढ रहा हूँ:
  • बापू के नजरिए को - उनकी कांग्रेस को ?
  • नेहरु की सोच को और उनकी कांग्रेस को? 
  • और!स्व . इंदिरा गाँधी के जीवट को और उनकी कांग्रेस को?
पता नहीं कहाँ है ?
  • वो पुरानी कांग्रेस?
  • वो पुरानी कांग्रेसी टोपी वाला जज्बा ?
  • वो हिंदोस्तानियत वाला जीवट 
या .........
  • "वो गाय-बछड़े" वाली कांग्रेस जो "पंजे" वाली कांग्रेस की असली माँ थी?

"कोई ढूंढे उस पुरानी वाली कांग्रेस को?
वोह पता नहीं कहाँ चली गई?
मैंने अपने दादा जी और नाना जी से सुना था-
वो कांग्रेस बहुत अच्छी थी!"
हाँ वो कांग्रेस बहुत अच्छी थी।

पर ....
अब पता नहीं ?
कहाँ चली गई ?
वो  पुरानी वाली कांग्रेस?