Tuesday, April 28, 2015

न जाने क्यों?

जाने क्यूं
अब शर्म से, चेहरे गुलाब नही होते।
जाने क्यूं
अब मस्त मौला मिजाज नही होते।
पहले बता दिया करते थे, दिल की बातें।
जाने क्यूं
अब चेहरे, खुली किताब नही होते।

सुना है
बिन कहे
दिल की बात समझ लेते थे।
गले लगते ही
दोस्त हालात समझ लेते थे।
जब ना फेस बुक थी
ना व्हाटस एप था
ना मोबाइल था
एक चिट्ठी से ही
दिलों के जज्बात समझ लेते थे।

सोचता हूं
हम कहां से कहां आ गये।
प्रेक्टीकली सोचते सोचते
भावनाओं को खा गये।
अब भाई भाई से
समस्या का समाधान कहां पूछता है
अब बेटा बाप से
उलझनों का निदान कहां पूछता है
बेटी नही पूछती
मां से गृहस्थी के सलीके।
अब कौन गुरु के चरणों में बैठकर
ज्ञान की परिभाषा सीखे।
परियों की बातें
अब किसे भाती है
अपनो की याद
अब किसे रुलाती है
अब कौन
गरीब को सखा बताता है
अब कहां
कृष्ण सुदामा को गले लगाता है
जिन्दगी मे
हम प्रेक्टिकल हो गये है
रोबोट बन गये है सब
इंसान जाने कहां खो गये है.......!!!

Monday, April 27, 2015

अगर गरीब होता... इश्क़ और ईश्वर के करीब होता!

सोचता हूँ........
काश गरीब होता...
थोड़ा सा बदनसीब होता....
फटा हुआ कपडा होता और
लूटा हुआ मन होता!

छोटी सी झोपडी होती...
बारिश में उसे छाने की चिंता होती...
छोटा सा चूल्हा होता...
खाना पकाने को ईधन की चिंता होती...
और टप टप चूता हुआ पानी का मटका होता..

इक चारपाई होतीं..
उधड़ी हुई रजाई होती..
सहेज कर रखा हुआ फटा हुआ कम्बल होता..
पुराने कपड़ों को ठूंस कर भरी हुई तकिया होती..
बीवी की साड़ी का पर्दा होता....
और..
पुराने जंग लगे संदूक में कुछ शादी की पायलें और बिछुए होते,चढ़ावे की साड़ी होती...

दो बच्चे होते..
थोड़ा कम पढ़े-लिखे सहमे-सहमे से होते...
रोटी-अचार-प्याज को खा कर संतुष्ट हो जाने वाले होते..
मोबाइल को ख्वाब समझते...
टीवी को तिलिस्म.. और कार को भय का भूत..

लेकिन -

इक प्यारी सी इन बच्चों को अम्मा होती...
तीन साड़ी दो ब्लाऊज और पेटीकोट में तन ढँक कर खेत पर मुझे खाना देने आती...
सिलबट्टे पर पिसी लहसुन प्याज की चटनी होती...
सूखी आलू टमाटर की सब्जी होती और बिर्रा की रोटी होती...

जब दोपहर में बैल ढील कर खाना खाता तो..
मेरे बच्चों की अम्मा..
निहारती मुझे खाना खाते  खाते... गटकते
पीने को पानी देती स्टील के गिलास में.. और
खाना ख़त्म होने पे बढ़ा देती अपना आँचल ; मुँह पौंछने को..
मैं थक कर लेट जाता झोपडी में.. और वो दबाने लगती पैर...
मैं पकड़ता उसका हाथ..
खींचता अपनी ओर.. तो
वो गिराती झोपडी का साडी का पर्दा.. झोपडी की मर्यादा.. में...
और समर्पित हो जाती बेल की तरह...
कुछ नारी सुलभ डरी हुई, कुछ सकुचाई सी और कुछ सहमी सी...

न कोई चिंता या फ़िक्र बच्चों के कैरियर की होती..
न कोटा होता न आई.आई.टी...
न मेडिकल इंट्रेंस होता न पी.एम.टी...
न इंटरनेट होता न टेबलेट..
न एसी होता न कूलर..

बस पेड़ की डालियों की भीनी भीनी हवा होती..
गाये का रम्भाना होता..
कुत्ते का भोंक कर वफादारी में पूँछ हिलाना होता और..
बच्चों का चिपक कर सो जाना होता...
नदियों का कल-कल होता..झरनों का झर-झर थोड़ी गरीबी होती..
थोड़ा सपनों को मारना होता...
अपनों को फटकारना.. और..
ज़िन्दगी को दुत्कारना होता!

न भूकम्प होते...
न जलजले...
न मोहब्बत में बेवफाई होती न दिलजले..
बस..
फिर सिर्फ मोहब्बत होती और उसके सिलसिले!
(गर्वित गौरव!)

Thursday, April 23, 2015

देख! मैं टूटा नहीं तेरे बिना!

देख!
अब रातों से डर नहीं लगता...
अब अंधेरों में डरावने ख्वाब दस्तक नहीं देते...
अब तन्हाईयाँ करवटें नहीं बदलती...
अब चादर की सलवटें तेरी जुस्तजू की मोहताज नहीं...

देख!
मैं ज़िंदा खड़ा हूँ अपने परों की उड़ान के साथ....
तेरी मोहब्बत की बैसाखियों के बिना...

देख!
सारा आकाश मेरे लिए बाहें पसारे है...
कायनात भी मुस्करा रही है... मुझे अकेला देख... क्यों की मैं भी मुस्करा रहा हूँ.. तेरे बिना!

देख!
मैंने साबित कर दी अपनी जीत!
मैंने कहा था न....
तेरे साथ सारी दुनिया पा लूँगा और तेरे बिना...
अपने को खोज लूँगा!
(गर्वित गौरव!)

Wednesday, April 22, 2015

ज़िन्दगी और धुप!

"चलो फिर गरम हवाओं का लुत्फ़ उठाये..
सर पे स्वाफी बाँध कर बाइक चलायें...
गर्मी की लपटों को चुनौती दें...
ज़िन्दगी को पतझड़ की अहमियत समझाएं....
अभी बहुत दूर का सफर बाकी है...
न थकूंगा न हारूँगा...
नियति का दस्तूर निभाउंगा...
ऐ ज़िन्दगी!
तू कर यकीन...
जीत कर आऊंगा! "
(गर्वित गौरव!) ������

छोटे मूह. बड़ी बात!

छोटे  मूह. बड़ी बात!
इक  पाती  छोटे  से कांग्रेसी  कार्यकर्ता  की :

"राहुल को शादी कर लेनी चाहिए... ४० + की उम्र बहुत होती है....

कब शादी करेंगे ..
कब ज़िन्दगी की किताब पढ़ेंगे
और
कब गांधी परिवार को वारिस देंगे?

अगर आज राहुल शादी करते हैं - तो २०४५ में -
"जूनियर  राहुल " या  "जूनियर प्रिंसेस" ३०  साल की युवा उम्र में फिर देश को और जनता को  फिर 'वोट ' के  संकोच में डालेंगे?
फिर  एक कम   अनुभवी नेतृत्व देश को २०४५ में 'दिया' जा सकता है!

आज ज़िन्दगी और राजनीति की दौड़ में
राहुल के पीछे होने के कारणों में -
एक कारण -
राहुल की कम उम्र और अनुभव की अपरिपक्वता भी है!

आप ही बताएं -
क्या आज राहुल + जी =राहुल जी 'नमो ' को
किस लिहाज से व्यक्तिगत टक्कर दे सकते हैं?

शिक्षा?
अनुभव?
हिन्दुस्तानियत?
ईमानदारी?
भारतीयता?

मैं यह नहीं कहता की वो कहीं कम हैं बल्कि
यह जानना चाहता हूँ की -
वो कहाँ पर अकल्पनीय असंभव महा मानवीय व्यक्तितव हैं? जिनपर मैं विश्वास कर सकूँ?

क्या सुन्दर भोला मासूम निश्छल सा दिखने वाला नवयुवक....
दबंग तेज़ हिम्मती नेतृत्व दे सकता है? मुझे शक है?
मेरी वफादारी भारत से है...
न भाजपा से...
और न कांग्रेस से! "

हिन्दोस्तान ज़िंदाबाद....

Friday, April 17, 2015

छुपाना।

अब कम्बखक्त क्या बताएं -
क्या होता है छुपाना  ……
कुछ यूँ समझ लो  ....
इक तज़ुर्बा होता है -छुपाना।

इक फलसफा अपने में समाये होता है -छुपाना।
इक लम्बा थका देने वाला  सफर होता है छुपाना।

शादी के पहले :

अपने मन की बात को अपने मन के अंदर छुपाना।
अपने प्यार को दुनियाँ से छुपाना।

अपने जज्बातों को अपने सपनों को छुपाना।
अपने आंसुओं को अपनी तन्हाइयों को छुपाना।

कुछ कसमों को कुछ वादों को छुपाना।
कुछ यादों को तो कुछ  बातों को छुपाना।

कुछ रातों को तो कुछ मुलाक़ातों को छुपाना।
कुछ गुनाहों को तो कुछ पनाहों को छुपाना।

कुछ चोटों को तो कुछ जख्मों को छुपाना।
कुछ फरेबों को तो कुछ बेवफ़ाइयों को छुपाना।

उस पहली खामोशी को छुपाना।
उस पहली "हाँ " को छुपाना।
उस पहली चिट्ठी को छुपाना।
उस पहले रूमाल को छुपाना।
उस पहली उड़ते दोपट्टे को उढ़ाने वाली बात को छुपाना  ....
और
उस भगवान के सामने मंदिर में सिन्दूर लगाने वाली बात को छुपाना।
सच  ....
बड़ा कठिन होता है छुपाना !

और अब शादी के बाद :
अपनी पुरानी दास्तान को छुपाना  ....
अपने मोहब्बत भरे कटु अनुभवों को छुपाना  ....
यादों को ,आसुओं को और पुराने गेसुओं को छुपाना  ....
बस छुपाना और छुपाना।

बच्चे बड़े होने पे :
दुःख को छुपाना ,संघर्ष को छुपाना ,आर्थिक तंगी को छुपाना
बीमारी को छुपाना ,जिल्लत को और बुढ़ापे को छुपाना

अपने आप से ;
अपनी  हार को छुपाना-अपनी खीज को छुपाना
अपने सपनों को और अपनी बीती यादों को फिर न मिटने देते हुए भी छुपाना।

अपने सफ़ेद होते बालों को  'डाई' लगा कर छुपाना।
अपनी स्वांस का इलाज 'होमियोपैथी' से करने की कोशिश कर बीमारी को छुपाना  …
और
जीवन साथी के सामने हमेशा की तरह हंस हंस कर सबकुछ छुपाना।

छुपाते छुपाते अपने आप को अपनों से  ....
छुपाते छुपाते अपने जज्बात को अपनों से  ....
छुपाते छुपाते अपनी सौगात को अपनों से  …
निकल गई ज़िन्दगी।

"कल तक आईने के सामने जो निहार कर छुपाते थे अपनी मोहब्बतें
अब छुपाने लगे हैं  कनपटियों के बगल से उग आई -सफ़ेद फसल। "

(उड़ते पंछी !)









Thursday, April 16, 2015

बिटिया!

घर आने पर दौड़ कर जो पास आये, उसे कहते हैं "बिटिया"
थक जाने पर प्यार से जो माथा सहलाए, उसे कहते हैं "बिटिया"
"कल दिला देंगे" कहने पर जो मान जाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
हर रोज़ समय पर दवा की जो याद दिलाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
घर को मन से फूल सा जो सजाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
सहते हुए भी अपने दुख जो छुपा जाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
दूर जाने पर जो बहुत रुलाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
पति की होकर भी पिता को जो ना भूल पाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
मीलों दूर होकर भी पास होने का जो एहसास दिलाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
"अनमोल हीरा" जो कहलाये, उसे कहते हैं "बिटिया" भगवान हर पिता को एक बेटी जरुर दे।।।������एक पापा।।

Monday, April 13, 2015

जाग मुसाफिर जाग!

चाहे तुम 'हिन्दू 'एयरलाइन्स से जाओ....
या 'मुस्लिम' वायुसेवा से....
मरने के बाद ऊपर पहुंचना प्लेटफार्म नंबर -एक पर ही है...

कृपया ध्यान दे की -ऊपर मर कर पहुँचने वाले आगंतुकों के लिए अलग अलग स्टाल /काउंटर की सुविधा नहीं है.....

हाँ! जन्म -मरण के चक्र से मुक्ति हेतु एवं पुनर्जन्म के आवेदनों के लिए अलग अलग काउंटर लगे हुए  हैं......
पुनर्जन्म के लिए पूर्वजन्म के क्रियाकलापों का कच्चा -चिठा अवश्य सत्यता से बयान करें....

पुनर्जन्म के लिए सभी योनियों के लिए एक ही लाइन है....
विवाद न करें: गाय, भैंस, बन्दर, गिलहरी, चींटी, खरगोश और कुत्ते को पुनर्जन्म की पंक्ति में आगे लगने दें एवं इंसान पीछे आये...

चाहे कोई लिबास पहन ले....
चाहे कोई खिजाब लगा ले....
चाहे जितनी ऊँची मूंछे कर ले या
चाहे जितनी लम्बी दाढ़ी कर ले....
वहां बेलिबास इंसान बन कर एक तराजू में तौला जायेगा तुझे....

घमंड किस बात का?
गुरूर किस चीज का?

प्यार कर..... थोड़ा सा प्यार कर..
और आगे बढ़!

ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा!
(उड़ते पंछी!)

Sunday, April 5, 2015

जीवन की सार्थकता और उदासियाँ !

उदासियाँ !
कभी कभी  ....
उदासियों का भी अपना फलसफा होता है  ....

उदासियाँ क्या हैं ? दुश्वारियां ?
उदासियाँ क्या है ? मजबूरियाँ ?
उदासियाँ क्या हैं ? जीवन की उबकाइयां ?
या  …… फिर  ....
तन्हाईयाँ ?

हकीकत में -
दुश्वारियां ,,मजबूरियाँ ,उबकाइयां और तन्हाईयाँ
सिर्फ ज़िन्दगी के फलसफे के पहले पायदान हैं  ....
जहाँ से शुरू होती है -
ज़िन्दगी की मंज़िलों की पहली उड़ान।

उड़ना कौन नहीं चाहता ?
नरेंद्र मोदी जैसी बेखौफ उड़ान  ....
अमिताभ बच्चन जैसी कठिन उड़ान  ....
राजकपूर जैसी स्वप्निल उड़ान  …
राजेश खन्ना जैसी बाबूमोशाए उड़ान  …
या फिर -
सायना नेहवाल से लेकर दीपिका पादुकोण जैसी कर्मठ  उड़ान।

कभी उदासी को न समझ लेना ज़िन्दगी की हार  ....
बल्कि उदासी है -सफलता का पहला प्रवेश द्वार। 


उदासी इक फितरत है -जो इतराती है पहेली बन के -
कि -तू अभी दूर है अपनी मंज़िल से  ....
उठ अपने आंसू पोंछ -थूंक गुटक और बढ़ चल  ....
मंज़िलों की ओर।

फिर चाहे मंज़िल -
मोहब्बत की हो  .... या फिर कैरियर की  ....
या अपनों के फिकर की।
उदासियाँ साथ देती हैं   ....
अंतिम पड़ाव तक  ....
बिना थके,बिना रुके और बिना हारे। 

उदासियाओं ने ही -
बापू को ट्रैन से धक्का दिलवाया था।
जयशंकर प्रसाद से कामायनी को रचवाया था।
हरिवंश राय बच्चन से मधुशाला -लिखवाया था।
भगत सिंह से असेंबली में बम फिंकवाया था।
भीमराओ अम्बेडकर से संविधान रचवाया था।
और -
धीरू भाई अम्बानी से साईकल पर सवारी कर  ....
रिलायंस को स्थापित करवाया था।

अक्सर उदासियाँ देती है -
मोहब्बत में -तन्हाईयाँ
सच्चे प्यार में -रुस्वाइयां
ख़्वाबों में -पतंगों का कटना और
अधजले अधकटे तहस नहस ज़िन्दगी के शुरूआती पन्ने।
पर  ....
यही उदासियाँ  …
बनती हैं -नींव की आधारशिला
जहाँ से बुलंद होती है -
इन्सां के कुछ कर दिखाने के जुनून की शुरुआत।

वो साबित करता है खुद के वज़ूद को  ....
खुद के इल्म को  ....
खुद के हुनर और सोच को और
दिखा देता है -दुनिया को -कि
दुनिया ने उसे समझने में भूल की।

सच उदासियाँ -
हमेशा साथ देती हैं  …
बिलकुल माँ -बाप की तरह
और अपने आँचल में छुपा लेती है  … दिलासा देने के लिए  …
कि  -हिम्मत न हार  …
और साबित कर अपने ख़्वाबों का सच   …।
अपने जीवन की सार्थकता।

(शानू !)

जीवन की सार्थकता और उदासियाँ !




Saturday, April 4, 2015

इंसानों के भेद !

कभी शराबियों को देखा है ?
कितने चिंतित ।
कितने बेख़ौफ़ ।
और -
कितने ग़मगीन  ?

कभी लावारिसों को देखा है ?
कितने सहमे।
कितने संकोची।
और -
कितने शांत ?

कभी अय्याशों को देखा है ?
कितने नमकीन।
कितने शौक़ीन।
और -
कितने जहीन ?

कभी प्रेमियों को देखा है ?
कितने विनम्र ।
कितने सलीकेदार।
और -
कितने जुबानदार या committed ?

कभी बेवफ़ाओं को देखा है ?
कितने समझदार।
कितने सलीकेदार।
और -
कितने इज़्ज़तदार ?

पर क्या कभी -
इंसानों को देखा है ?
शेर सा शिकारी।
बाज़ सा मौका परस्त।
और -
गिद्ध सा भूँखा।

शायद परिभाषाओं को बदलने का सही समय आ गया है !
काश ऐसी कोई "एन्टी -ह्यूमन वाइरस " (Anti human virus) बाजार में आ जाये जो इन इंसानो के भेद कर पाये  .... तो शायद यह ज़िन्दगी कुछ आसान हो जाये !

इंसानों के भेद !

हमसफ़र और प्यार -इक अंतर !

देख  .... गौर से देख  …
मेरे बगल में जो है ;वो मेरी ज़िन्दगी है।


मेरी हमसफ़र है।

कैसे मेरे काँधे पे अपना सर टिकाये है ना  ?
कैसे उसकी आँखों में समर्पण है -मेरे लिए ना ?
कैसे अपने बाहुपाश में आलिंगन किये है मुझे ना ?
और  .......
कैसे अपनी मांग में मुझे सजाये है ना ?

न  जाने कितनी बार तुझमे भी ढूंढी थी मैंने -अपनी ज़िंदगी !
उसकी परछाइयाँ और ख्वाब  ....
पर मिलीं सिर्फ तुझसे -
रुसवाईयाँ और तन्हाईयाँ।
न जाने क्यों ?

क्या कमी थी मुझमे ?आज तक समझ में नहीं आया ?
जब जब शीशे में अपने को देखता हूँ तो बरबस ढूंढने लगता हूँ -अपना वो "निकम्मापन " जिसके कारण तुमने भुला दिया था मुझे।
जब जब  … अब कभी -मेरी वर्तमान -'ज़िन्दगी' मुझे कभी ज्यादा प्यार करती है- तो याद आती है -तुम्हारी दुत्कार और नफरत !
सच लगता है की 'शायद' बहुत कुछ था मुझमे प्यार किये जाने के लिए और शायद तुम्ही देख न पाईं हो जरा गौर से मुझे ?

आज भी सच बहुत सहानभूति है मुझे तुझ से और तेरे प्यार से   ....
जानती हो क्यों ?
क्यों की इन्सा कभी अपना पहला प्यार नहीं भूल पता है और जो चीज न मिली हो उसकी ख्वाईश हमेशा तूफानी मन में सुगबुगाती रहती है। कभी अच्छे रूप में -प्यार बन कर और कभी कभी  बुरे रूप में नफरत बन कर !

बहुत दूर 'फ़्लैश बैक ' में तुम याद आती हो -अपनी बातों के साथ  … वफाओं के साथ  ....
और आज तुम्हें देखता हूँ - तो तुम्हें पाता हूँ-तुम्हारी हाथों की लकीरों और रातों के साथ।

सच बड़ा अंतर होता है उम्र का  .... और समय का।
एक समय पे -समय कम पड़ जाता था एक दुसरे के लिए  और
अब ज़िन्दगी हाथ फैलाये पड़ी है.... और हम बहुत दूर हैं।