देख!
अब रातों से डर नहीं लगता...
अब अंधेरों में डरावने ख्वाब दस्तक नहीं देते...
अब तन्हाईयाँ करवटें नहीं बदलती...
अब चादर की सलवटें तेरी जुस्तजू की मोहताज नहीं...
देख!
मैं ज़िंदा खड़ा हूँ अपने परों की उड़ान के साथ....
तेरी मोहब्बत की बैसाखियों के बिना...
देख!
सारा आकाश मेरे लिए बाहें पसारे है...
कायनात भी मुस्करा रही है... मुझे अकेला देख... क्यों की मैं भी मुस्करा रहा हूँ.. तेरे बिना!
देख!
मैंने साबित कर दी अपनी जीत!
मैंने कहा था न....
तेरे साथ सारी दुनिया पा लूँगा और तेरे बिना...
अपने को खोज लूँगा!
(गर्वित गौरव!)
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