सोचता हूँ........
काश गरीब होता...
थोड़ा सा बदनसीब होता....
फटा हुआ कपडा होता और
लूटा हुआ मन होता!
छोटी सी झोपडी होती...
बारिश में उसे छाने की चिंता होती...
छोटा सा चूल्हा होता...
खाना पकाने को ईधन की चिंता होती...
और टप टप चूता हुआ पानी का मटका होता..
इक चारपाई होतीं..
उधड़ी हुई रजाई होती..
सहेज कर रखा हुआ फटा हुआ कम्बल होता..
पुराने कपड़ों को ठूंस कर भरी हुई तकिया होती..
बीवी की साड़ी का पर्दा होता....
और..
पुराने जंग लगे संदूक में कुछ शादी की पायलें और बिछुए होते,चढ़ावे की साड़ी होती...
दो बच्चे होते..
थोड़ा कम पढ़े-लिखे सहमे-सहमे से होते...
रोटी-अचार-प्याज को खा कर संतुष्ट हो जाने वाले होते..
मोबाइल को ख्वाब समझते...
टीवी को तिलिस्म.. और कार को भय का भूत..
लेकिन -
इक प्यारी सी इन बच्चों को अम्मा होती...
तीन साड़ी दो ब्लाऊज और पेटीकोट में तन ढँक कर खेत पर मुझे खाना देने आती...
सिलबट्टे पर पिसी लहसुन प्याज की चटनी होती...
सूखी आलू टमाटर की सब्जी होती और बिर्रा की रोटी होती...
जब दोपहर में बैल ढील कर खाना खाता तो..
मेरे बच्चों की अम्मा..
निहारती मुझे खाना खाते खाते... गटकते
पीने को पानी देती स्टील के गिलास में.. और
खाना ख़त्म होने पे बढ़ा देती अपना आँचल ; मुँह पौंछने को..
मैं थक कर लेट जाता झोपडी में.. और वो दबाने लगती पैर...
मैं पकड़ता उसका हाथ..
खींचता अपनी ओर.. तो
वो गिराती झोपडी का साडी का पर्दा.. झोपडी की मर्यादा.. में...
और समर्पित हो जाती बेल की तरह...
कुछ नारी सुलभ डरी हुई, कुछ सकुचाई सी और कुछ सहमी सी...
न कोई चिंता या फ़िक्र बच्चों के कैरियर की होती..
न कोटा होता न आई.आई.टी...
न मेडिकल इंट्रेंस होता न पी.एम.टी...
न इंटरनेट होता न टेबलेट..
न एसी होता न कूलर..
बस पेड़ की डालियों की भीनी भीनी हवा होती..
गाये का रम्भाना होता..
कुत्ते का भोंक कर वफादारी में पूँछ हिलाना होता और..
बच्चों का चिपक कर सो जाना होता...
नदियों का कल-कल होता..झरनों का झर-झर थोड़ी गरीबी होती..
थोड़ा सपनों को मारना होता...
अपनों को फटकारना.. और..
ज़िन्दगी को दुत्कारना होता!
न भूकम्प होते...
न जलजले...
न मोहब्बत में बेवफाई होती न दिलजले..
बस..
फिर सिर्फ मोहब्बत होती और उसके सिलसिले!
(गर्वित गौरव!)
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