Sunday, April 5, 2015

जीवन की सार्थकता और उदासियाँ !

उदासियाँ !
कभी कभी  ....
उदासियों का भी अपना फलसफा होता है  ....

उदासियाँ क्या हैं ? दुश्वारियां ?
उदासियाँ क्या है ? मजबूरियाँ ?
उदासियाँ क्या हैं ? जीवन की उबकाइयां ?
या  …… फिर  ....
तन्हाईयाँ ?

हकीकत में -
दुश्वारियां ,,मजबूरियाँ ,उबकाइयां और तन्हाईयाँ
सिर्फ ज़िन्दगी के फलसफे के पहले पायदान हैं  ....
जहाँ से शुरू होती है -
ज़िन्दगी की मंज़िलों की पहली उड़ान।

उड़ना कौन नहीं चाहता ?
नरेंद्र मोदी जैसी बेखौफ उड़ान  ....
अमिताभ बच्चन जैसी कठिन उड़ान  ....
राजकपूर जैसी स्वप्निल उड़ान  …
राजेश खन्ना जैसी बाबूमोशाए उड़ान  …
या फिर -
सायना नेहवाल से लेकर दीपिका पादुकोण जैसी कर्मठ  उड़ान।

कभी उदासी को न समझ लेना ज़िन्दगी की हार  ....
बल्कि उदासी है -सफलता का पहला प्रवेश द्वार। 


उदासी इक फितरत है -जो इतराती है पहेली बन के -
कि -तू अभी दूर है अपनी मंज़िल से  ....
उठ अपने आंसू पोंछ -थूंक गुटक और बढ़ चल  ....
मंज़िलों की ओर।

फिर चाहे मंज़िल -
मोहब्बत की हो  .... या फिर कैरियर की  ....
या अपनों के फिकर की।
उदासियाँ साथ देती हैं   ....
अंतिम पड़ाव तक  ....
बिना थके,बिना रुके और बिना हारे। 

उदासियाओं ने ही -
बापू को ट्रैन से धक्का दिलवाया था।
जयशंकर प्रसाद से कामायनी को रचवाया था।
हरिवंश राय बच्चन से मधुशाला -लिखवाया था।
भगत सिंह से असेंबली में बम फिंकवाया था।
भीमराओ अम्बेडकर से संविधान रचवाया था।
और -
धीरू भाई अम्बानी से साईकल पर सवारी कर  ....
रिलायंस को स्थापित करवाया था।

अक्सर उदासियाँ देती है -
मोहब्बत में -तन्हाईयाँ
सच्चे प्यार में -रुस्वाइयां
ख़्वाबों में -पतंगों का कटना और
अधजले अधकटे तहस नहस ज़िन्दगी के शुरूआती पन्ने।
पर  ....
यही उदासियाँ  …
बनती हैं -नींव की आधारशिला
जहाँ से बुलंद होती है -
इन्सां के कुछ कर दिखाने के जुनून की शुरुआत।

वो साबित करता है खुद के वज़ूद को  ....
खुद के इल्म को  ....
खुद के हुनर और सोच को और
दिखा देता है -दुनिया को -कि
दुनिया ने उसे समझने में भूल की।

सच उदासियाँ -
हमेशा साथ देती हैं  …
बिलकुल माँ -बाप की तरह
और अपने आँचल में छुपा लेती है  … दिलासा देने के लिए  …
कि  -हिम्मत न हार  …
और साबित कर अपने ख़्वाबों का सच   …।
अपने जीवन की सार्थकता।

(शानू !)

जीवन की सार्थकता और उदासियाँ !




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