देख .... गौर से देख …
मेरे बगल में जो है ;वो मेरी ज़िन्दगी है।
मेरी हमसफ़र है।
कैसे मेरे काँधे पे अपना सर टिकाये है ना ?
कैसे उसकी आँखों में समर्पण है -मेरे लिए ना ?
कैसे अपने बाहुपाश में आलिंगन किये है मुझे ना ?
और .......
कैसे अपनी मांग में मुझे सजाये है ना ?
न जाने कितनी बार तुझमे भी ढूंढी थी मैंने -अपनी ज़िंदगी !
उसकी परछाइयाँ और ख्वाब ....
पर मिलीं सिर्फ तुझसे -
रुसवाईयाँ और तन्हाईयाँ।
न जाने क्यों ?
क्या कमी थी मुझमे ?आज तक समझ में नहीं आया ?
जब जब शीशे में अपने को देखता हूँ तो बरबस ढूंढने लगता हूँ -अपना वो "निकम्मापन " जिसके कारण तुमने भुला दिया था मुझे।
जब जब … अब कभी -मेरी वर्तमान -'ज़िन्दगी' मुझे कभी ज्यादा प्यार करती है- तो याद आती है -तुम्हारी दुत्कार और नफरत !
सच लगता है की 'शायद' बहुत कुछ था मुझमे प्यार किये जाने के लिए और शायद तुम्ही देख न पाईं हो जरा गौर से मुझे ?
आज भी सच बहुत सहानभूति है मुझे तुझ से और तेरे प्यार से ....
जानती हो क्यों ?
क्यों की इन्सा कभी अपना पहला प्यार नहीं भूल पता है और जो चीज न मिली हो उसकी ख्वाईश हमेशा तूफानी मन में सुगबुगाती रहती है। कभी अच्छे रूप में -प्यार बन कर और कभी कभी बुरे रूप में नफरत बन कर !
बहुत दूर 'फ़्लैश बैक ' में तुम याद आती हो -अपनी बातों के साथ … वफाओं के साथ ....
और आज तुम्हें देखता हूँ - तो तुम्हें पाता हूँ-तुम्हारी हाथों की लकीरों और रातों के साथ।
सच बड़ा अंतर होता है उम्र का .... और समय का।
एक समय पे -समय कम पड़ जाता था एक दुसरे के लिए और
अब ज़िन्दगी हाथ फैलाये पड़ी है.... और हम बहुत दूर हैं।
मेरे बगल में जो है ;वो मेरी ज़िन्दगी है।
कैसे मेरे काँधे पे अपना सर टिकाये है ना ?
कैसे उसकी आँखों में समर्पण है -मेरे लिए ना ?
कैसे अपने बाहुपाश में आलिंगन किये है मुझे ना ?
और .......
कैसे अपनी मांग में मुझे सजाये है ना ?
न जाने कितनी बार तुझमे भी ढूंढी थी मैंने -अपनी ज़िंदगी !
उसकी परछाइयाँ और ख्वाब ....
पर मिलीं सिर्फ तुझसे -
रुसवाईयाँ और तन्हाईयाँ।
न जाने क्यों ?
क्या कमी थी मुझमे ?आज तक समझ में नहीं आया ?
जब जब शीशे में अपने को देखता हूँ तो बरबस ढूंढने लगता हूँ -अपना वो "निकम्मापन " जिसके कारण तुमने भुला दिया था मुझे।
जब जब … अब कभी -मेरी वर्तमान -'ज़िन्दगी' मुझे कभी ज्यादा प्यार करती है- तो याद आती है -तुम्हारी दुत्कार और नफरत !
सच लगता है की 'शायद' बहुत कुछ था मुझमे प्यार किये जाने के लिए और शायद तुम्ही देख न पाईं हो जरा गौर से मुझे ?
आज भी सच बहुत सहानभूति है मुझे तुझ से और तेरे प्यार से ....
जानती हो क्यों ?
क्यों की इन्सा कभी अपना पहला प्यार नहीं भूल पता है और जो चीज न मिली हो उसकी ख्वाईश हमेशा तूफानी मन में सुगबुगाती रहती है। कभी अच्छे रूप में -प्यार बन कर और कभी कभी बुरे रूप में नफरत बन कर !
बहुत दूर 'फ़्लैश बैक ' में तुम याद आती हो -अपनी बातों के साथ … वफाओं के साथ ....
और आज तुम्हें देखता हूँ - तो तुम्हें पाता हूँ-तुम्हारी हाथों की लकीरों और रातों के साथ।
सच बड़ा अंतर होता है उम्र का .... और समय का।
एक समय पे -समय कम पड़ जाता था एक दुसरे के लिए और
अब ज़िन्दगी हाथ फैलाये पड़ी है.... और हम बहुत दूर हैं।

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