संवेदनाएं अक्सर मिल जाती हैं ,
अपनों को तलाशते हुए …
किसी चौराहे पे या किसी गली कूचे में।
अब मल्हमों ने जख्मों को भरना बंद कर दिया है ....
आसूओं ने भी पोरों के सूखेपन को नमी देना बंद कर दिया है …और
थूंक ने गले के रश्क को ठंडक और सुकूँ देना रोक दिया है …
पता नहीं क्यों ?????
दिल भी धड़कता है निरुद्देश्य ……
बस ज़िंदा ज़िंदा पर सूखा सूखा .......
धमनियों को भी अब बोरियत होने लगी है …
इस बेजुबान बेजान दिल को धड़काने में !
सारी भावनाएं बहुत दूर चली गईं हैं …… लावारिस हालात में ,
किसी गली कूचे चौराहे पे …अपनों को तलाशते हुए ....
Black & White छाया चित्रों की तरह।
पता नहीं क्यों -
दिल ने गाना बंद कर दिया है ....
आँखों ने खोना ....
लबों ने थरथराना बंद कर दिया है …और
ख़्वाबों ने आना।
जज्बात अब रोते नहीं हैं ....
रातें अब भीगी नहीं होती ....... और अब
नींद किसी की बाट नहीं जोहती।
सब कुछ खत्म सा हो गया है ;अपनों के बीच
संवेदनाओं को तलाशते हुए।
- अब रात को पापा के बाथरूम जाने पे -बेटा नहीं बदलता बाथरूम का फ्यूज बल्ब कि -पापा अँधेरे में गिर न जाएँ!
- अब असमय माँ के जाने के बाद -पापा के पैर नहीं दबता कोई और पापा बदलते रहते हैं -सारी रात करवट ; स्वर्गीय माँ की बाट में।
वहीँ दूसरी ओर -
- पापा के जाने पे -किचन में बहू ने माँ के चाय के कप अलग से निकाल दिए कि ये -पीले वाले कप -माँजी के हैं।
- माँ के हाथ की सोंधी रोटी अब अक्सर मिल ही जाती है -शहर या कस्बों के बाहर -ढाबों की भट्टियों में …
- बहिन की रेशम की डोर भी अक्सर तौलती मिल जाती है अपना वजन और वजूद -आधा किलो .. एक किलो - मिठाई वालों की दुकान में -रक्षाबंधन या भाई दोज पे ……
- अब लिफाफों को लेकर डाकिया बाबू भी नहीं आता -जिसमे राखी के साथ हल्दी और चावलों का टीका बहुत दूर से चल कर आता था -भाई की रक्षा और स्नेह के लिए।
क्या करूँ अब राखी के बंधन ने बदल दिया है अपने भाई के पास जाने का तरीका:
PDF Files Attachments, Email या Whats App -पे अक्सर मिल जाता है ये रिश्ता सुगबुगाता हुआ …… सकुचाता हुआ …आँखें चुराता हुआ …… अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ता हुआ !
"माँ -या पापा के ख़तम होने पे … कांधा देने .... बेटे -बहू …नाती नातियों के साथ उनके स्कूल Miss कर पहुँच ही जाते हैं उस पिछड़े गावं में …जहाँ माँ -पापा ने अपने बेटों के जन्म पे चौक के दिन ख़ुशी में पूर्वजों की पुरानी भरतल बन्दूक से हवाई हर्ष फायर किये थे और बधाई पुजवाई थी।"
क्या करें ज़िन्दगी अब बहुत "Fast" हो गई है :
शादी पे -सात फेरों का सात जन्मों वाला "Concept " से अब बोरियत होने लगी है और
किसी के मरने पे 13 वें दिन तेरहवी वाले "Concept " ने तो नौकरी करना ही मुश्किल कर दिया है ?
अब कैसे समझाएं कि -छुट्टी कैसे मिलती है ?
लेकिन ……
ज़िन्दगी ज़िंदा है …
अपने अस्तित्व के अंतिम पॉयदान की लड़ाई लड़ने में -
उस Professionalism से .... उस IIT से .... उस KOTA से .... उस B Tech से ....
उस MBBS से या उस MBA से या Pune -Bangalore -Hyderabad -Mumbai-Delhi से
जहाँ ……
संवेदनाएं बहुत पीछे छूट गयीं हैं।
"इतनी धूल और सीमेंट है
शहरों की हवाओं में
आजकल...
कब दिल पत्थर का
हो जाता है पता
ही नहीं चलता…!!"

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