Wednesday, July 25, 2012

जंगल का राजा कौन? हम या तुम?

मै इक शेर हूँ -
आजकल मेरी बहुत चर्चा है -
इंडियन एक्सप्रेस से लेकर दैनिक भास्कर तक....
'आज-तक' से लेकर 'दूरदर्शन' तक....
और भी न जाने कहाँ कहाँ तक.......
सारे ज़माने को मेरी बहुत चिंता है !
हो भी क्यों न?
मेरे बाप-दादों से लेकर मौसी-मौसाजिओं  तक-
सभी तो शहीद हुए है,इसी सरजमीं पे-
और पाया है-अपने प्राणों की बली देकर,
"Endangered species" का तमगा
तथा "Tiger Reserve" की जमीन का हक!
और ....
"Buffer Zone" एवम "Core Area" जैसे शब्दों का विवादित उपहार?

कितना सही है-अपनी ही जन्म-भूमि पे अपने ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ना?
अपने ही जंगल में अपने लिए दस फुट सुकून की जमीन तलाशना?
और................
अपने आप को जंगल का राजा कहलाना?

इससे तो बेहतर होता अगर मै -
अपने आप को 'राजा' नहीं अपितु 'भईया'कहलाता?
और मेरी मौसी अथवा माँ-'बहनजी' कहलाती?
कम से कम.....
इज्ज़त और सुकून तो मिलता?

जहाँ तक पन्ना नेशनल पार्क अथवा पन्ना टाईगर रिज़र्व का सवाल है-
मेरी गुफा और घर का सवाल तो दूर की बात है-
भाई लोगों ने अपने फायदे के लिए वहां-टौरिया टेक के पास 'सराय और धर्मशाला' तक बना डाली?
कहते है कि वे 'पर्यावरण-विद ' है; और हमारे शुभ  चिन्तक हैं?
अरे! हम पे अध्ययन किया है उन्होंने और 'सराय'बना के हमें उसी सराय मे रोकेंगे?
आओ किसी दिन???
बेहतरीन पार्टी होगी और दारु-मुर्गा का मजा लेंगे???

अरे ज्यादा दूर मत जाओ-पन्ना मे ही अपना 'पेड़ पे घर' है
आओ किसी दिन-
पेड़ पे ही 'दारु-मुर्गा' के ऐश होंगे?
कभी सेवा का मौका अवश्य दे?
हम आभारी होंगे?

एक बहुत बड़े वाले हैं -उन्होने पन्ना के पास एक बड़ा 'किला'खड़ा कर दिया है-कहते हैं -'पत्थरों का घर' है-
वो मेरा -'Tented accommodation' में -"An encounter with Tiger"; करवाते हैं या दम भरते है-
अरे आप समझे नहीं-हमारा और उन होटल वालों का 'टाई अप' है....
किसी की रोजी-रोटी चलती है तो चलने दो !
आखिर हमारा क्या जाता है?
हम तो इस संसार के-
वो चलते फिरते 'expiry date' के वो फीके पकवान है
जिसका नहीं कोई कदरदान है?

अरे ! कभी मेरी जंगल  की गुफा में सो के देखो?
पत्थरों के  गढ़  की बात करते हो????
मुझे कौन बतायेगा?
जब मेरी एक गुफा ही नहीं तो फिर तुम्हारी -सराय कैसे?
जब मेरा एक पहाड़ ही नहीं तो फिर तुम्हारा पूरा पाषाण गढ़ कैसे?
कौन देगा जवाब???



"Please do not disturb!We are sleeping!"

Tuesday, July 24, 2012

उठा-पटक -BJP की- असर जनता पे!

"शैलेन्द्र बरुआ जी को बुंदेलखंड से छीन लेना बिलकुल वैसा ही है जैसे समंदर से कोई पानी निकल ले या डूबते  से कोई उसकी डोर छीन ले!ऐसा बुन्देली मानुस का कथन है !लेकिन कभी कभी खामोशी अपने अन्दर की भीरुता का परिचायक भी हो जाती है! इक अंग्रेजी मे कथन है की -"attack is the best defense"! 
  • और इसी की उत्पती "हल्ला -बोल "आन्दोलन था!
  • चुनाव मे नेताजी को नोटों से तुलने मे मज़ा नहीं 
          आता बल्कि सिक्कों की खनखनाहट उनके आत्म-विश्वास को बढ़ा देती है!
  • समुन्दर की शांत -चित्त लहरों  ने मनुष्य को भुला दिया था कि -वह क्या चीज़ है?परन्तु उसकी इक "सुनामी ";कि हुंकार ने कई देशों को तबाह कर दिया ! 
  • जब बच्चा रोता है ,तभी माँ दूध पिलाती है !
सौ की सीधी बात कहें -
  • बुंदेलखंड नहीं चाहता था कि -आप को उससे दूर किया जाए लेकिन ऐसा हुआ !
          ऐसा इस लिए हुआ क्योकि "सिक्के " -यानी "हम" शांत रहे !
दूसरी बात यह है कि -बहुत ज़ियादा सिक्कों के बीच "इक हज़ार" का नोट ही काफी होता है .....
और 
वह भी हमसे छीन लिया गया ! "
"देख लेना जनता की हुंकार सुनाई  देगी और वो भी 'सुनामी' की तरह!"

Sunday, July 22, 2012

यूँ तो कोई बेवफा नहीं होता?"

 यूँ तो कोई बेवफा नहीं होता?"
"कब से हिसाब लगा रहा हूँ कि-
हम-दोनों कि मुहोब्बत में
कौन हम दोनों में से एक दुसरे को ज्यादा चाहता था?

तुमने हमेशा इस बात पे ध्यान दिया कि -
कोई देख न ले या किसी को पता न चल जाए
और इसी कश -मा -कश में दो ज़िंदगियाँ बिछड  गईं

मैंने हमेशा सोचा कि -
किसी तरह तुमसे मिल लूं ;चाहे जो हो जाए!
और इसी कश -मा -कश  मे सब कुछ ख़त्म हो गया!

अब गलती किसकी है?
खता किसकी है?
सज़ा  किसकी है?
रज़ा  किसकी है? और ....
कौन करेगा फैसला?

तुम्हें याद होगा कि जब हम आखिर बार मिले  थे तुम्हारी मौसी के यहाँ-
तुम खूब रोई थीं और मुझसे बोलीं थीं कि -
यह हमारा आख़िरी मिलना है,जो करना है कर लो और मेरे शरीर पे ऐसी छाप छोड़ दो कि मै तुम्हें ज़िन्दगी भर न भूल पाऊ!
उस रात जब दो बज रहे थे सुबह तुम्हारा पेपर था-
मैंने धीरे से अपने आसूओं की चंद बूंदें तुम्हारी मांग पे गिराई ,तुम्हारे माथे को चूमा और तुम्हारी पोरों पे ढलक आये आसुओं को पोंछा और चुप चाप अपने घर चला आया!
जानती हो-
तब से आज तक मै चुप-चाप चल रहा हूँ और सोचता हूँ कि -
आखिर गलती कहाँ हो गई?
मेरे अन्दर साहस नहीं था?
या
भगवान्  मेरे साथ नहीं था?
अथवा.....
मेरा प्यार पवित्र और पावन नहीं था
या और भी न जाने क्या क्या ............
बस ......
यही सोच लेता हूँ कि -
कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी वरना यूँ तो कोई बेवफा नहीं होता?"


Thursday, July 19, 2012

तुम राजेश खन्ना थे- पर सिर्फ खुद के लिए!!!!




तुम राजेश खन्ना थे- पर सिर्फ खुद के लिए!
पर हमारे लिए -
एक ज़िन्दगी का आइना थे!
जानते हो क्यों?
तो सुनो आज तुम्हारे जाने के बाद ...........

तुम किसी के प्यार की पवित्रता थे!(मेरे जीवन साथी )
तुम किसी के स्नेह का बंधन थे!(रोटी)
तुम ज़िन्दगी की जिंदादिली थे और सच्चे दोस्त की निशानी थे!(आनंद)
तुम आशिक थे!(आराधना)
और असफल प्रेम की हकीकत थे!(कटी-पतंग)

पर तुम और भी बहुत कुछ थे-

इक जिंदादिल इंसान थे!
एक मनमौजी शक्सियत थे!
एक स्वाभिमानी पुरुष थे!
एक आत्मबल से लबा -लब व्यक्तित्व थे!

फिर भी तुम हमेशा याद कीए जाओगे -
अपनी दिलचस्प अदाओं के लिए
अपनी भोले,निश्चल, सरल, भावुक, सुन्दर मुखड़े के लिए-
अपनी दिलफेंक हंसी के लिए
अपनी रूमानियत के लिए
अपनी आँखों की कशिश के लिए
और और और .......
हम सब के दिल में बसे अनोखे प्रेम के लिए -
क्यों की -
तुमने करोड़ों भारतीयों की अधूरी प्रेम कहानियों को बांटा-
अधूरे स्वप्नों को पूरा किया-
अधूरी उमंगों को सार्थक किया-
और......
सालों साल .......
स्वप्नों को जिंदा रखा!

राजेश तुझे सलाम!
राजेश तुझे प्रणाम!
अलविदा राजेश......
अलविदा......
अलविदा.....
अनोखी यात्रा में ......
अलविदा .........
पैक अप- पैक अप पैक-अप ......


"पत्रकार-प्रताड़ना एवम प्रतिकार "

"श्रम जीवी पत्रकार" -यानि "सत्यम शिवम् सुन्दरम" का वह समन्वित रूप जहाँ 'पत्रकारिता' के माध्यम से लोकतंत्र का चौथा 'स्तम्भ' परिश्रम को अपना के अपने जीवकोपार्जन की कोशिश कर रहा हैं!हाँ -'श्रम' ही 'जीवन' का अमुर्त्य 'सत्य' है और 'पत्रकारिता' जैसे पेशे को अपना के हम अपनी 'कलम' मे 'विष' समान नीली सियाही भर के अपने हलक में उढेल के शिव के संहारक रूप को चरितार्थ कर 'सत्य' के 'सुन्दर'रूप की रक्षा कर रहें है!
जैसे कभी बादल- सूरज की तेज़ रोशिनी को नहीं रोक पाता  हैं,आंधी कभी प्रकाश को धूमिल नहीं कर पाती है और प्रतिभा कभी शहर की चका-चौंध की मोहताज़ नहीं रहती है वैसे ही सत्य भी कभी झूठ के शिविर  में नहीं पलता है और दीया कभी अंधेरों से समझौता नहीं करता है!
जैसे-" दोस्ती कभी मोहताज़ नहीं होती है -उम्र,पलों या घंटों की;कभी इसके लिए  काफी होता है इक मुट्ठी भर विश्वास और कभी कम पड़ जाता है ज़िन्दगी भर का फैलाव"; वैसे ही आज इक 'दीया' भी संघर्ष कर रहा है उस 'अँधेरे' से जिससे हारना उसके नियति बन चुकी है!
आदरणीय महानुभावों -'दीया' यहाँ 'पत्रकार' है और 'अँधेरा' यहाँ 'भ्रष्टाचार' है!'नियति 'बनाने वाली 'बिरादरी' को हम 'पुलिस' कहते है 'प्रशासन' कहतें है या 'सत्ता' भी कह सकतें हैं!"पत्रकार-प्रताड़ना एवम प्रतिकार ";जैसे संवेदनशील विषय पे कुछ बोलना कुछ वैसा ही है जैसे- जीवन भर  कर्मठता से काम करने के बाद-कोई बेटा अपने पिता से बोले कि -"तुमने किया ही क्या है?" और पिता चुप-चाप अपना थूंक गुटक ले,पसीना पौंछ ले और सोचे की -चलो नियति को यही मंजूर था -बच्चे खुश रहें-और हमें क्या चाहिये है?
हम भी सत्य की बैसाखी को थामे- कोशिश करते है कि सत्य और इमानदारी के मर्म को समाज और उसके रखवालों तक पहुंचा पायें परन्तु हमारी निजी ज़िन्दगी में 'प्रताड़ना' कुछ इस कदर हावी हो गई है कि 'सत्य' की बैसाखी को अपनी अस्मिता और अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है!पूरी पत्रकार बिरादरी 'प्रताड़ना'से नहीं डरती अपितु हम उस मानसिकता का 'प्रतिकार' करते है जो हमारे साथ साथ हमारे पूरे परिवार को भी तहस-नहस कर देती है!
हमें यह मालूम है कि-किसी अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रताड़ना इक प्रमुख कारण होता है और 'प्रतिकार' तक पहुचते पहुँचते 'प्रताड़ना'-'मंजिल' में बदल जाती है!किसी भी 'आन्दोलन' की शरुआत 'प्रताड़ना' से ही होती है और अंत 'प्रतिकार' से!वीर भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद और सुखदेव की प्रताड़ना ने ही राष्ट्र-पिता महात्मा गाँधी के प्रतिकार को जन्म दिया था और देश को और हमें आज़ादी की मंजिल मिली थी!
हम लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ है और हमारे ऊपर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है-सत्य की रक्षा करने की,उसको उजागर करने की और शोषित एवं शासक  के बीच इक समन्वित सेतु के निर्माण करने  की! हम कोशिश तो बहुत कर रहे हैं और हमेशा करेंगे भी  परन्तु 'प्रताड़ना' का एहसास हमें न सिर्फ अपने लक्ष्य व कर्म के प्रति हतौत्साहित करता है अपितु कुंठित भी करता है !हमे मालूम है कि 'सोना' तप  कर ही खरा बनता है और हम तपने से भी  नहीं डरते हैं परन्तु 'तपने' को 'प्रताड़ना' की 'भट्टी' से जोड़ना गलत है!
हाँ ! हमे दुःख है कि हमारी व्यवस्था में कुछ ऐसी कमियां है कि -सूरज को भी साबित करना पड़ता है कि उसकी तेज़ और कठोर धूप  -जीवन दायनी है और विटामिन 'डी' देती है!हवा को भी साबित करना पड़ता है कि वह जहरीली नहीं है और 'कलम' को भी  साबित करना पड़ता है कि उसकी 'स्याही' 'सत्य' के साथ है और वह 'सियाह-पोशों' की गुलाम नहीं है!परन्तु क्या कभी आपने  सोचा है कि यह 'प्रकृति के निर्विवाद शाश्वत सिद्धांत' और 'सत्य और न्याय' जैसे सामाजिक फलसफे  कब तक यूँ ही अपने आप को साबित करते रहेंगे और सीता-द्रौपदी की तरह प्रताड़ना का दंश झेलते रहेंगे?
आपको पता होगा कि देश कि रक्षा के प्रति समर्पित 'फौज' में सबसे ज्यादा शहीद 'infantry' ब्रिगेड के जवान होते हैं क्यों कि वे वास्तविक युद्ध का हिस्सा होते हैं और पैदल सेना कहलाते हैं!Infantry के पीछे 'tank' होते हैं फिर E.M.E.(electronics  & mechanical) wings होती हैं,Ordinance होती हैं!ठीक उसी तरह हम भी देश की 'Internal security ';आन्तरिक सुरक्षा का अहम् हिस्सा हैं और 'Infantry Brigade' की तरह आप हमें सदैव घटना-स्थल पे अपने हथियारों के साथ अर्थात कैमरा-कलम के साथ चाक -चौबंद पाएँगे!हम शहीद होने को तैयार हैं क्यों कि  हमें और हमारे परिवार को इस बात पर  गर्व होगा कि-हम अपने कर्तव्य पथ पे काम आए परन्तु दुःख और लज्जा का अहिसास तब होगा जब हमें या हमारे परिवार को पता चलेगा कि अपने ही देश में  यह शहादत -शहादत नहीं अपितु प्रताड़ित कर की गई हत्या या हत्या का प्रयास है!शायद एक परिवार तहस-नहस हो जायगा और भविष्य में कोई भी बच्चा कलम पकड के सत्य का साथ देने की कोशिश नहीं करेगा!
प्रताड़ना से मेरा अभिप्राय सिर्फ -शारीरिक प्रताड़ना से नहीं है अपितु हमें सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक और प्रशासनिक प्रताडनाओं का भी सामना करना पड़ता है!चाहे वह दहेज़ का राक्षस हो या भ्रूण हत्या हो या बाल-विवाह की कुरीति हो अथवा दारुखोरी,गुंडागर्दी एवम भ्रष्टाचार हो-हर कुरीति का वाहक हमें प्रताड़ित करने की कोशिश करता है और यह साबित करने का दु:साहस करता है कि -"हम दूध के धुले नहीं है !" अरे भाई ठीक है हम दूध के धुले नहीं है पर ऊपर से नीचे तक कोयले से नहाए भी तो नहीं हैं?हम कब कहतें हैं कि -हम दूध के धुले भगवान शंकर हैं ?अरे भाई हम 'नंदी' हैं-भगवन शंकर के  नंदी -जो 'श्रम' से 'जीवन सत्य' की 'खोज' करते  है और -'श्रम-जीवी' कहलाते है!हम श्रमजीवी पत्रकार हैं; जो सत्य की आहूती में स्वयं ही समर्पित हो जाते हैं!हमें अपनी चिंता नहीं है -झोंक दो जहाँ झोकना हो फंसा दो जहाँ फंसाना हो पर चिंता है अपने परिवार की, अपने समाज की और अपने देश की?चिंता है कि भविष्य मे कहीं ऐसा न हो कि-प्रताड़ना का यह "छुपा रुस्तम" कहीं भविष्य में पत्रकारिता के जज्बे को ही न निगल जाये  और समाज से इक बिरादरी का हमेशा हमेशा  के लिए खात्मा हो जाए!हम चिंतन के लिए क्यों इक्कठा हुए है?क्या है हमारी चिंता?चिंता है -समाज की इक पौध के समाप्त हो जाने की? चिंता है इक पत्रकारिता की नस्ल ख़त्म हो जाने की ? और चिंता है चिरंतर सत्य के ख़त्म हो जाने की?आखिर हो भी क्यों न?बात पत्रकारिता के साथ साथ देश हित से भी जुडी हुई है!मित्रो,महानुभावों और साथियों-आओ कुछ नवीन गढ़ें,कुछ नवीन रचें ,कुछ नवीन सोचें!आओ सोचें बुंदेलखंड की 20 वर्ष बाद की पत्रकारिता के विषय में - उसके मापदंडों की और उसकी निर्भीकता एवम निष्पछ्ता के सन्दर्भ में!आओ सोचने का निवेदन करें प्रशासनिक तंत्र से,सरकार से और आम जन-मानस से कि पत्रकारिता नाम की "endangered species " या कहें कि - मानव प्रजाती के इस विलुप्त होती श्रंखला को जिसे हम -पत्रकार कह रहे है कहीं सही मे ख़त्म न हो जाए और आने वाली पीढियां सोचने को मजबूर हो जाये कि -पत्रकारिता भी कोई व्यवसाय होता था अथवा होगा या हो सकता है? 
महान बुंदेलखंड की इस ऐतहासिक धरा पर- जिसे हम कभी खजूर वाटिका कहते थे और आज खजुराहो कह रहे हैं इस घंभीर  सम्मेलन का आयोजन अपने आप में इक ऐतहासिक घटना है और इतिहास में इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं की यहाँ लीया गया निर्णय हमेशा प्रासंगिक एवं तर्क पूर्ण रहा है!चंदेलों से लेकर अर्जुन सिंह तक और दिग्विजय सिंह से लेकर उमा भारती तक तथा बाबूलाल गौर से लेकर माननीय शिव राज सिंह जी चौहान तक ने अपने अपने समय में इस वीर धरा की माटी का महत्व समझा और माना है!
जब आज खजुराहो के सफ़र पे स्वंय 'कलम और कैमरा' चल कर आये  हैं तो ऐसा कैसे होगा कि  'वक़्त और शय ' के ये दो अमर साथी जिन्हें हम 'कलम और कैमरा'कह रहे हैं अपने आने की छाप  न छोड़े!खजुराहो आये तो अपनी सियाही और अपनी बेट्री की चर्चा करने थे पर खजुराहो का दुःख और दर्द भी कुछ कुछ समझ में आ रहा है जिसे मैं नीचे कुछ पंक्तियों में व्यक्त करना चाहता हूँ- 

"हमने  बदलते  हुए खजुराहो को देखा है-
इक जंगल को शहर बनते देखा है-
इक पिछड़े गाँव को क़स्बा बनते देखा है- 
हमने अपने खजुराहो को शनै शनै सवरते देखा है,
हमने अपने खजुराहो को शनै शनै मरते देखा है, 
हमने खजुराहो को बदलते देखा है ll 

टी.एस.बर्ट को खजुराहो खोजते देखा है,
मुन्ना राजा,नाती राजा को नेतृत्तव करते देखा है, 
अपने ब्रिजेन्द्र सिंह मामाजी को मंदिरों पे बोलते देखा है, 
स्व.महाराज जी को खजुराहो बसाते देखा है,
छोटे बच्चों को गाईड बनते देखा है ,उनका संघर्ष देखा है, 
पांच सितारा होटलें बनते देखी है, 
चंदेला होटल की नीव के पत्थर देखें है, 
चार्टरड फ्लीट को उतरते देखा है, 
हमने खजुराहो को बदलते देखा है ll

हमने खजुराहो को संवरते देखा है-
रैडिसन, क्लार्क्स और चंदेला को बनते देखा है,
शिल्पग्राम और कन्दारिया को सजते देखा है,
एअरपोर्ट पे हवाई जहाज उतरते देखा है, 
साइलेंट जोन के लिए चारो दिशाओं से गेट बंद होते देखे हैं ,
टूरिस्ट पुलिस को मुस्तैद देखा है,
यहाँ की सूनी आँखों में विदेश जाने के सपने पलते देखा है,
हमने खजुराहो को संवरते देखा है ll

और अंत मे -
हमने अपने खजुराहो को शनै-शनै  धीरे-धीरे मरते  देखा है- 
खजुराहो मे सड़को को उखड़ते देखा है,
खजुराहो के इक सबसे पुराने तालाब को सुखा के उस पे सड़क बनते  देखा है ,
शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन का इंतज़ार करते यात्री देखें हैं, 
रोजगार के लिए पलायन करते युवाओं को देखा है, 
स्टेट बैंक मे ग्राहकों की भीड़ को देखा है, 
ख़राब ए.टी .ऍम . मशीन को देखा है, 
और अपनी मूछों को नुकीली कर बुन्देली जनता को  पांच सितारा होटलों मे चौकीदार बन "सलाम-साहिब" बोलते देखा है, 
सच म़े -
हमने अपने खजुराहो को शनै-शनै  धीरे-धीरे मरते  देखा है!!"
और अंत में अपनी उस बुन्देली कलम से उस बुन्देली सौंधी मिट्टी की महक को भी शत-शत वंदन निम्न चंद  पंक्तियों से करना चाहूँगा-
मैं बुंदेलखंड हूँ!   "
"तपते पर्वत,बंजर धरती,
लपट और तेज़ गर्मी और उमस से भरे दिन,
तीखी हाड कंपाती सर्द रातें,
मेरा छोटा सा भूगोलिक परिचय है!
मैं बहुत अभागा भी हूँ-
अलगात के विस्तृत रेत के समुद्र तटों से मैं परे हूँ !
हरियाली से हरी-भरी हसीन वादिओं से बहुत दूर हूँ!
सफ़ेद बर्फ से आच्छादित पर्वतों से कटा हूँ !
 और .....
प्रकृति से थोड़ी अन-बन होने के कारण-
दिखने मे थोडा 'ठस' लगता हूँ और 
देखने-सुनने मे गाँव का लगता हूँ !
शायद थोडा -'बैकवर्ड क्लास' का हूँ !
मेरे पथरीले  रास्तों पर जो बस गए-वो-
मुश्किल भरी ज़िन्दगी गुजार रहे है-
  • गरीबी,अशिक्षा से संघर्ष जारी है-
  • टाटा-बिरला-अम्बानी के औद्योगिक प्रोजेक्टों का अभी भी इंतज़ार है-
  • एम्स,बॉम्बे हॉस्पिटल,सहारा अस्पताल शायद ही यहाँ कभी स्थापित हों-
क्यों कि -हमारे हुक्मरानों की नजर मे-
  • बुंदेलखंडियो की साँसों की डोर की कीमत थोडा कम है-
  • वो मेहनत मैं थोडा संकोच करते हैं 
और...
  • पैसा खर्च करने मे थोडा कंजूस है!
कभी हम 'उमा श्री' में अपना अक्स देखतें हैं 
कभी 'बाबूलाल गौर जी' को आका समझतें हैं 
या 'शिव' में 'उद्धारक' का रूप' तलाशते हैं 
अथवा 
'सत्यव्रत' की बाट जोहते हैं!
पर इक ऐसी बात है जो शायद किसी ने गौर नहीं की-
दोस्तों!
  • मैं भूकम्पों से बहुत सुरक्षित हूँ -
  • जलजलों से अपने लोगों को हमेशा बचाता हूँ-
  • बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं से दूर हूँ -
और ....
  • मन  का साफ़ हूँ! 
बस इक ही ख्वाब है-
कभी दिल्ली मे बैठे हुए लोग-
मेरे साफ़ मन को देखें और 
शताब्दी एक्सप्रेस से खजुराहो आकर 
मेरी मंगली कुंडली पे विचार करें!

मै अपने श्रमजीवी पत्रकार भाईओं से कहना चाहता हूँ कि डूबते को तो तिनके का सहारा होता है फिर हमारे हाथ में तो कलम है ;फिर डर किस बात का?इतने विशिष्ट अतिथियों के सामने अपनी बात रखने से कोई न कोई हल जरूर निकलेगा!फिर हम तो पत्रकार हैं और जो चीज़ हमें सबसे अलग बनती है और हमारी छुपी हुई ताक़त है वह है -हमारी जीवटता,संघर्ष और सहन शीलता!हम अपनी इस ताक़त के दम पे मुकाम पे जरूर पहुचेंगे!

 "मिलेगा जहाँ जब कोशिश करोगे ,
चमकेगा आसमा जब आतीश बनोगे,
बस कुछ लम्हे ना बनकर रह जाना तुम यहाँ,
 बात तो तब होगी जब किसी की ख़्वाहिश बनोगे.
होता है असर बातो का -ज़माने को झुकने का बहाना दो,
 अपने सरफ़रोश इरादो को -कामयाबी का ठिकाना दो,
काँपते है जमी और आसमा- बस एक तूफ़ान चाहिए,
लोगो की कुछ फ़ार्माइशों पर -अपनी फ़तह का फ़साना दो.
अरे !तुम्हे ख़ाक करने से तो आग भी डरती है,
फिर छोटी सी मुश्किल क्या मंसूबे लेकर जीती है?
अरे! तुम तो उड़ते हो अक्सर उसी आकाश में,
जिसे छुने को अक्सर ये दुनिया तरसती है.
आसमा से उपर.... एक उड़ान की ख़्वाहिश है..!!
जहाँ हो हर क़दम सितारो पर.... उस ज़मीन की ख़्वाहिश है..!!
 जहाँ पहचान हो लहू की हर एक बूँद की.... उस नाम की ख़्वाहिश है..!!
जहाँ खुदा भी आके मुझसे पूछे..... "बता, क्या लिखू तेरे मुक्क़दर मे....?"
उस मुकाम की ख़्वाहिश है..!!
उस मुकाम की ख़्वाहिश है..!!"


चंद जुमले बन के कागज पर बिखर जाता हूँ मैं ... जिस नजर से देखिये वैसा ही नजर आता हूँ मैं ..

धन्यवाद !!!


Thursday, July 12, 2012

I May Never See Tomorrow!

I May  Never  See  Tomorrow
 
I may never see tomorrow  , there's  no guarantee.
And   things  that happened  yesterday belong to history.
I can't predict the future, I  can't change the past.
 
I  have  just  the present  memories to treat as my last.
I must use this moment wisely, for soon it will pass away,
And be lost forever as a part  of yesterday.
 
I  must  exercise  compassion,
Be a  friend  unto  the friendless ,make their life complete,
 
The  unkind   things  I do today  may  never be undone,
And friendship that I fail to win, may never more be won.
I may not have another chance on bended knees to pray,
And I  thank God with a humble  heart for giving me this day!

Monday, July 9, 2012

Lesson!

Don't Choose The 0ne
Who Is Beautiful To The World.
But Rather
Choose The 0ne Who
Makes Your World Beautiful.

Smile!

Smiling can boost your mood and even your immune system. Keep reading for more fascinating facts about our smiles.
 
Forcing yourself to smile can boost your mood: Psychologists have found that even if you’re in bad mood, you can instantly lift your spirits by forcing yourself to smile.
 
It boosts your immune system: Smiling really can improve your physical health, too. Your body is more relaxed when you smile, which contributes to good health and a stronger immune system.
 
Smiles are contagious: It’s not just a saying: smiling really is contagious, scientists say. In a study conducted in Sweden, people had difficulty frowning when they looked at other subjects who were smiling, and their muscles twitched into smiles all on their own.
 
Smiles Relieve Stress: Your body immediately releases endorphins when you smile, even when you force it. This sudden change in mood will help you feel better and release stress.
 
It’s easier to smile than to frown: Scientists have discovered that your body has to work harder and use more muscles to frown than it does to smile.
 
It’s a universal sign of happiness: While hand shakes, hugs, and bows all have varying meanings across cultures, smiling is known around the world and in all cultures as a sign of happiness and acceptance.
 
We still smile at work: While we smile less at work than we do at home, 30% of subjects in a research study smiled five to 20 times a day, and 28% smiled over 20 times per day at the office.
 
Smiles use from 5 to 53 facial muscles: Just smiling can require your body to use up to 53 muscles, but some smiles only use 5 muscle movements.
 
Babies are born with the ability to smile: Babies learn a lot of behaviors and sounds from watching the people around them, but scientists believe that all babies are born with the ability, since even blind babies smile.
 
Smiling helps you get promoted: Smiles make a person seem more attractive, sociable and confident, and people who smile more are more likely to get a promotion.
 
Smiles are the most easily recognizable facial expression: People can recognize smiles from up to 300 feet away, making it the most easily recognizable facial expression.
 
Women smile more than men: Generally, women smile more than men, but when they participate in similar work or social roles, they smile the same amount. This finding leads scientists to believe that gender roles are quite flexible. Boy babies, though, do smile less than girl babies, who also make more eye contact.
 
Smiles are more attractive than makeup: A research study conducted by Orbit Complete discovered that 69% of people find women more attractive when they smile than when they are wearing makeup.
 
There are 19 different types of smiles: UC-San Francisco researcher identified 19 types of smiles and put them into two categories: polite “social” smiles which engage fewer muscles, and sincere “felt” smiles that use more muscles on both sides of the face.
 
Babies start smiling as newborns: Most doctors believe that real smiles occur when babies are awake at the age of four-to-six weeks, but babies start smiling in their sleep as soon as they’re born.
 
 

Thursday, July 5, 2012

कभी-कभी कुछ हट के !


"कभी सूखते हुए पेड़ को सहला के देखो -
कभी उजड़ते हुए गाँव की मिट्टी को उड़ते देखो- उसके सौंधेपन का अहसास करो-
कभी डाली से गिरे फूल को उठा के देखो-
कभी घायल परिंदे को पानी पिला के देखो-
शायद तुम्हें .....
वो सभी याद आयें जो हमारे आदर्श है!! 

पेड़ से बात करने पे कोई तुम्हे पागल नहीं कहेगा?
उजडती बस्ती के मौन पदचापों की आवाज सुनने पे कोई तुम्हे बावरा नहीं कहेगा?
डाली के टूटे पुष्प को उठाने से कोई तुम्हें -'भौंरा' नहीं कहेगा ?
और ....
किसी घायल पंक्षी को उठा के पानी पिला देने से कोई तुम्हें -चिडीबाज़ नहीं कहेगा ?
बल्कि ....
तुम्हारी यह छोटी छोटी बातें-सुरक्षित कर देंगी भविष्य मे-
मानवता और इंसानियत के जज्बे को ......
अपनी आगे आने वाली पीढियों के लिए!!"

और कभी किसी रात या शाम को-
अपने बुजुर्ग पिता  की उस पतलून पे हाथ फेर के देखो जो कभी गंदी नहीं हुई माँ के जिंदा रहते-
पर आज....
उसका बटन टूटा है और चैन खराब हो गई है!
शायद ....
उस बुढ़ाते पैंट में हम अपना-
सुरक्षित बुढ़ापा देख लें!"