"शैलेन्द्र बरुआ जी को बुंदेलखंड से छीन लेना बिलकुल वैसा ही है जैसे समंदर से कोई पानी निकल ले या डूबते से कोई उसकी डोर छीन ले!ऐसा बुन्देली मानुस का कथन है !लेकिन कभी कभी खामोशी अपने अन्दर की भीरुता का परिचायक भी हो जाती है! इक अंग्रेजी मे कथन है की -"attack is the best defense"!
- और इसी की उत्पती "हल्ला -बोल "आन्दोलन था!
- चुनाव मे नेताजी को नोटों से तुलने मे मज़ा नहीं
आता बल्कि सिक्कों की खनखनाहट उनके आत्म-विश्वास को बढ़ा देती है!
- समुन्दर की शांत -चित्त लहरों ने मनुष्य को भुला दिया था कि -वह क्या चीज़ है?परन्तु उसकी इक "सुनामी ";कि हुंकार ने कई देशों को तबाह कर दिया !
- जब बच्चा रोता है ,तभी माँ दूध पिलाती है !
सौ की सीधी बात कहें -
- बुंदेलखंड नहीं चाहता था कि -आप को उससे दूर किया जाए लेकिन ऐसा हुआ !
ऐसा इस लिए हुआ क्योकि "सिक्के " -यानी "हम" शांत रहे !
दूसरी बात यह है कि -बहुत ज़ियादा सिक्कों के बीच "इक हज़ार" का नोट ही काफी होता है .....
और
वह भी हमसे छीन लिया गया ! "
"देख लेना जनता की हुंकार सुनाई देगी और वो भी 'सुनामी' की तरह!"
"देख लेना जनता की हुंकार सुनाई देगी और वो भी 'सुनामी' की तरह!"
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