यूँ तो कोई बेवफा नहीं होता?"
"कब से हिसाब लगा रहा हूँ कि-हम-दोनों कि मुहोब्बत में
कौन हम दोनों में से एक दुसरे को ज्यादा चाहता था?
तुमने हमेशा इस बात पे ध्यान दिया कि -
कोई देख न ले या किसी को पता न चल जाए
और इसी कश -मा -कश में दो ज़िंदगियाँ बिछड गईं
मैंने हमेशा सोचा कि -
किसी तरह तुमसे मिल लूं ;चाहे जो हो जाए!
और इसी कश -मा -कश मे सब कुछ ख़त्म हो गया!
अब गलती किसकी है?
खता किसकी है?
सज़ा किसकी है?
रज़ा किसकी है? और ....
कौन करेगा फैसला?
तुम्हें याद होगा कि जब हम आखिर बार मिले थे तुम्हारी मौसी के यहाँ-
तुम खूब रोई थीं और मुझसे बोलीं थीं कि -
यह हमारा आख़िरी मिलना है,जो करना है कर लो और मेरे शरीर पे ऐसी छाप छोड़ दो कि मै तुम्हें ज़िन्दगी भर न भूल पाऊ!
उस रात जब दो बज रहे थे सुबह तुम्हारा पेपर था-
मैंने धीरे से अपने आसूओं की चंद बूंदें तुम्हारी मांग पे गिराई ,तुम्हारे माथे को चूमा और तुम्हारी पोरों पे ढलक आये आसुओं को पोंछा और चुप चाप अपने घर चला आया!
जानती हो-
तब से आज तक मै चुप-चाप चल रहा हूँ और सोचता हूँ कि -
आखिर गलती कहाँ हो गई?
मेरे अन्दर साहस नहीं था?
या
भगवान् मेरे साथ नहीं था?
अथवा.....
मेरा प्यार पवित्र और पावन नहीं था
या और भी न जाने क्या क्या ............
बस ......
यही सोच लेता हूँ कि -
कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी वरना यूँ तो कोई बेवफा नहीं होता?"


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