Thursday, July 5, 2012

कभी-कभी कुछ हट के !


"कभी सूखते हुए पेड़ को सहला के देखो -
कभी उजड़ते हुए गाँव की मिट्टी को उड़ते देखो- उसके सौंधेपन का अहसास करो-
कभी डाली से गिरे फूल को उठा के देखो-
कभी घायल परिंदे को पानी पिला के देखो-
शायद तुम्हें .....
वो सभी याद आयें जो हमारे आदर्श है!! 

पेड़ से बात करने पे कोई तुम्हे पागल नहीं कहेगा?
उजडती बस्ती के मौन पदचापों की आवाज सुनने पे कोई तुम्हे बावरा नहीं कहेगा?
डाली के टूटे पुष्प को उठाने से कोई तुम्हें -'भौंरा' नहीं कहेगा ?
और ....
किसी घायल पंक्षी को उठा के पानी पिला देने से कोई तुम्हें -चिडीबाज़ नहीं कहेगा ?
बल्कि ....
तुम्हारी यह छोटी छोटी बातें-सुरक्षित कर देंगी भविष्य मे-
मानवता और इंसानियत के जज्बे को ......
अपनी आगे आने वाली पीढियों के लिए!!"

और कभी किसी रात या शाम को-
अपने बुजुर्ग पिता  की उस पतलून पे हाथ फेर के देखो जो कभी गंदी नहीं हुई माँ के जिंदा रहते-
पर आज....
उसका बटन टूटा है और चैन खराब हो गई है!
शायद ....
उस बुढ़ाते पैंट में हम अपना-
सुरक्षित बुढ़ापा देख लें!"



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