Sunday, October 22, 2017

बुझे दीयों का धुंआ !

चलो उठा लें ..
वे सब मिटटी के दिए ..
जो अपनी पारी खेल कर ..
घर की देहरियों पर ..पड़े हुए हैं ..
कदमों तले ..
कुचले जाने को ;
दिवाली बाद !

कुछ बुजुर्ग भी ..
अपनी जीवट वाली पारी खेलने के बाद ..
कुछ कुछ ऐसे ही ..
चुके हुए दीयों की माफिक ..
गुज़ार रहे हैं ..
अपनी बची-खुची ..थकी हुई साँसें ..
किसी छत के नीचे ..बरामदे में ..
या घर के पिछवाड़े वाले ..
मरम्मत मांगते कमरे में !

देख लेते हैं वे ..उस टूटे पलंग और ..
जंग लगे कबाड़ में .
'अपना' अक्स और वज़ूद ;
जो उनके बेटों ने ..घर के बाहर ..
निकाल दिया है ..
दिवाली की सफाई में ..
कबाड़ी को ..
बेचने की खातिर !

कैसी ज़िन्दगी है न ??
जो दिवाली की रात .. झिलमिल दिया था !
वह दिवाली बाद ..
बुझा हुआ मिटटी का लोंदा ?

जो ता उम्र पापा या पिताजी रहे वे बुढ़ापे में ..
"ओह्हो डैडी ;आप समझते क्यों नहीं ..
आप अंदर जाईये !"

खैर ..
ये फलसफे की बातें हैं  ..तुम नहीं समझोगे !
जब कभी ..एक ज़माने बाद ..
मोतियाबिंद होगा और डाक्टर के पास ..
जाना पड़ेगा तो ..
मेरी ये बातें याद आएँगी !!

( गर्वित गौरव !)

Saturday, October 21, 2017

और दिवाली निकल गई !!

एक बच्चा!
वो रोता रहा फुलझड़ी के लिए ..
वो सुबकता रहा मिठाई के लिए ...
वो सिसकता रहा नए कपड़ों के लिए ..
और दिवाली निकल गई !!

एक पिता -
वो गिड़गिड़ाता रहा बोनस के लिए ..
वो मनुहारता रहा कुछ दिन और की छुट्टी के लिए ...
वो खरीदते रहा घरवालों के लिए अपनी वेतन में भेंटें ...
और ..
दिवाली निकल गई !

एक पत्नी -
वो सजाती संवारती रही खुद को उनके आने के इन्तिज़ार में ..
वो सींचती रही फूलों की बगिया उनके आने पर फूलों का गज़रा पहनने के इन्तिज़ार में ...
वो देखती रही मुड़ मुड़ कर अपने अक्स को शीशे में ....
और ..
दिवाली निकल गई !

Tuesday, October 17, 2017

शब्दों में बंधी...मेरी शुभकामनाएं !!

आदरणीय स्वजन!

"इस दीपावली ...
इक नन्हा सा "दिया" ..
मेरी तरफ से भी ...
स्वीकार हो !!"

चलो प्रकाशित करें ..
'प्रकाश' से 'अन्धकार' को !
आलोकित करें 'ज्ञान' से .. 'अज्ञान' को !
और प्रज्ज्वलित करें ..
'देशप्रेम' और 'सौहार्द' को !

जहां जहां तक भी ..
स्वयं के 'अक्स' की ...
'रौशनी' जाती हो ...
वहाँ वहाँ तक ...हम साबित करें ...
अपने वज़ूद को !

रच दें ..एक ऐसा 'कथानक' ;
जो मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के ..
'श्री' चरणों जैसा हो !!

अपने कर्तव्य पथ पर ..
डटे रहें !!
ज़िन्दगी से समझौते /सौदे कर ...
न कभी झुकें ..न बिकें !!

लक्ष्य पूरे करें और लक्ष्य पूरे करने में ..
दूसरों को मदद भी करें !!

दूर कहीं ..घर में बैठे ..
पूज्य बुजुर्गों का ..
आशीर्वाद लें और ...
छोटों को अपना बहुमूल्य स्नेह दें !

बंधु !
जिसने इन रिश्तों और
अपने कर्तव्यों को निभाया ..
यकीनन उसने ..
दीपक की 'सार्थकता' को  स्वीकार कर ..
स्वयं को ..
दीपक की भांति ...
परिभाषित किया !

अंत में ..
चलो इस दीपावली ...
किसी की ..
अमावस की काली रातों को ..
निजि दीयों से ..
प्रकाशित कर ..
पूर्णमासी की तरह ..
जीवन तरंगों से ..
प्रकाशित और परिभाषित  करने का ..
छोटा सा जतन ...
और यत्न करें !

"जीवन को वृहद विहंगम और ब्रह्म स्वरूप में आत्मसात करने का निवेदन करता हुआ ..."
पुनः शुभकामनाओं सहित ..
सदैव आपका  ..स्नेहिल
(गौरव खरे !)

Monday, October 16, 2017

रिश्ता ..फोटो फ्रेम से !

कोई पीछे नहीं ...
न कोई आगे !
बस काला सा प्रारब्ध ...
और फीका सा ..भविष्य !

और मैं ..
डूबता पुच्छल तारा सा ..
निरे ब्रह्म्हाण्ड में ..
विचारों के गोते लगाता हुआ !

और ऐसे ही ..एक दिन
खो जाऊँगा ...
गंगा से गंगोत्री तक ..
बेनाम ..बेवक़्त ..बदनाम हो कर ..
अपने खट्टे मीठे ..अनुभवों के साथ !

फिर शायद ...
कभी मेरे बेटे और बेटी लगाएंगे ..
एक दो अगरबत्ती ..
मेरे फोटो फ्रेम पे और ...
टपका देंगे ..
दो बून्द आसुओं की ..
अपने पापा के ..
फोटो फ्रेम के शीशे पे ..
और कहेंगे -
चुप हो जाओ ..
देखो पापा जी मुस्करा रहे हैं !

बस ...
इतना ही जीवन है ..
और बाकी यथार्थ की ...
कटु मृत्यु !

आप अमर हो जाते हैं ..
अपने लाड़लों के ...
आसुओं में या ...
खो जाते हैं ...
यादों के अंधड़ में !!

हताशा ! जय पराजय की ..

"हताश ...
अपनी पराजय से नहीं होता !
हताश ...
उनकी जय से होता हूँ ..
जो मुझसे आगे निकल गए ..
दूसरे रास्तों से !

रास्ते तो एक थे ...
जो सत्य और मेहनत से ..
सफलता की ओर खुलते थे !
फिर वे ...
उन रास्तों से कैसे ...
लक्ष्य तक पहुंचे ..
जो गलत थे ?

ऊपर से उनकी जय जय कार ?

मैं कभी नहीं हार मानता !
क्यूंकि असल में ...
मैं कभी जीता ही नहीं !

बस ...
जीतने वालों के जतन से ...
खुद के जतनों की ...तुलना ..
अवश्य करने लगता हूँ ...
और ...
इसी तुलानत्मक अध्ययन में ..
जीतने वाले हो जाते हैं'-बेनक़ाब !

यदि जीतना ही सर्वोपरि है ..
तो फिर ..
गलत रास्ते ..गलत क्यों ??
और सही ...सत्य क्यों ??

जानते हो ...
जो अपनी मेहनत से ..
जीतता है ...
वह सिर्फ मुस्कराता है !

और गलत तरीके से ..
विजयश्री प्राप्त करने वाला ..
अट्हास से ...
जब मर्दन करता है तो ...
निस्तब्धता ...
उसकी गलत विजय की प्रमाणिकता बन जाती है !!"

Wednesday, October 11, 2017

इस दिवाली !

घर की देहरी पे ..दिए जलाने से ..
क्या फायदे ??
दिलों के दिए जलाओ ..
तो हम जानें !!

दो दियों की बाती ..
मिलाने से क्या फायदे ??
गले लग जाओ ;
तो हम जानें !

प्रभु राम की विजय ..
मनाने से क्या फायदे ??
प्रभु राम जैसा ..
बन कर दिखाओ तो हम जानें !!

(Garvit Gaurav! )


Wednesday, October 4, 2017

रफ कॉपी सी ज़िन्दगी !!

रफ कॉपी सी गुज़र गई ज़िन्दगी !!
बेतरतीब बेपरवाह और बदरंग कवर सी !
खूब लिखा ..
खूब गोदा गया ..
और फिर रद्दी वाले के हाथों ..
बेशर्मी से बेच दिया गया !

पीछे के पन्नों में लिखते रहे हम ;
अपने अपने ख्वाब और ..
आगे के पन्नों को फाड़ते रहे -कि ..
किसी रोज़ न हो जाएँ ;
बेनक़ाब !

पीछे के पन्नों में ..
कितने दिलों को बेधा हमने;
तीरों से गोद गोद ..
और
ज़िन्दगी के पन्नों पे ..
कोरे रह गए ;
जैसे हों बिलकुल; अबोध !

बहुत से रॉकेट बनाये हमने पन्ने फाड़ के ..
पर कमबख्त :
किसी ने हमें ही फाड़ दिया ...
पहले चढ़ा कर ...
चने के झाड़ पे !

और कुछ ऐसे ही ..
बेसाख्ता ..
लोग मिलते गए ..
मेरे दिल की किताब से !

अपने दस्तखत करते गए ..
कभी दिल बना देते थे तो ..
कभी मिटा देते थे ..
बिलकुल निर्लजः बन !

मैं भी ब्लॉटिंग पेपर या सोख्ता बन ..
जज्ब करता गया ..
उनके जतन और
आखिर में ..
रफ कॉपी के जैसा ..
मेरे वज़ूद का भी हो गया दमन !!

और ..
आज पड़ा हुआ हूँ ..
देश के एक कोनें में ...
बिलकुल रद्दी की टोकरी जैसा  ...
बदबू देता हुआ ..सड़ा गला ..
जिसे देख ..रद्दी वाला भी ..
नाक भों सिकोड़ ...निकल जाता है -
लतियाता हुआ !

आज सोचता हूँ कि ..
काश ;
किसी की 'फेयर कॉपी' का ..
हिस्सा बन पाता तो ..
आज ये हाल ..
न हुआ होता ...
और मैं ..
बेहाल न हुआ होता !

Sunday, October 1, 2017

और ऐसे कट गया इक जीवन सफर !!

फासले थे तो रास्ते बने !
रास्ते बने तो होंसले मिले !
होंसले मिले तो पंख उगे !
पंख उगे तो उड़ान भरी !
उड़ान भरी तो आकाश मिला!
आकाश मिला तो लक्ष्य सधा! लक्ष्य सधा तो मंज़िल मिली !
मंज़िल मिली तो ख्याति मिली !
ख्याति मिली तो अहं जगा !
अहं जगा तो फासले बने !
फासले बने तो ..
फिर रास्ते बने !!

और ऐसे कट गया इक जीवन सफर !!