चलो उठा लें ..
वे सब मिटटी के दिए ..
जो अपनी पारी खेल कर ..
घर की देहरियों पर ..पड़े हुए हैं ..
कदमों तले ..
कुचले जाने को ;
दिवाली बाद !
कुछ बुजुर्ग भी ..
अपनी जीवट वाली पारी खेलने के बाद ..
कुछ कुछ ऐसे ही ..
चुके हुए दीयों की माफिक ..
गुज़ार रहे हैं ..
अपनी बची-खुची ..थकी हुई साँसें ..
किसी छत के नीचे ..बरामदे में ..
या घर के पिछवाड़े वाले ..
मरम्मत मांगते कमरे में !
देख लेते हैं वे ..उस टूटे पलंग और ..
जंग लगे कबाड़ में .
'अपना' अक्स और वज़ूद ;
जो उनके बेटों ने ..घर के बाहर ..
निकाल दिया है ..
दिवाली की सफाई में ..
कबाड़ी को ..
बेचने की खातिर !
कैसी ज़िन्दगी है न ??
जो दिवाली की रात .. झिलमिल दिया था !
वह दिवाली बाद ..
बुझा हुआ मिटटी का लोंदा ?
जो ता उम्र पापा या पिताजी रहे वे बुढ़ापे में ..
"ओह्हो डैडी ;आप समझते क्यों नहीं ..
आप अंदर जाईये !"
खैर ..
ये फलसफे की बातें हैं ..तुम नहीं समझोगे !
जब कभी ..एक ज़माने बाद ..
मोतियाबिंद होगा और डाक्टर के पास ..
जाना पड़ेगा तो ..
मेरी ये बातें याद आएँगी !!
( गर्वित गौरव !)