और वो उजला दिन भी पूरा हुआ-
जब कुछ सिर्फ चुनी हुई चंद तक़दीरों के ख्वाब-
मत पेटियों में बंद हो गए।
और.....
लाखों-करोड़ों वोट डालने वाले जिंदादिल और बुजदिलों के ख्वाब-
चुनाव जीतने वालों की किस्मत की लकीरों-
में फ़ना हो गए।
कितनी ख़ुशी के वो दिन थे-
जब तुम अपनी औकात से-
हमारी देहलीज पे आते थे।
हाथ जोड़ कर वोट मांगते थे -
और.....
उन चंद लम्हों के लिए ही सही-
हम भी विधायक बन जाते थे।
चलो यही सही -इस ज़िन्दगी में -
कुछ दिनों के लिए -तुम अपनी असली नस्ल और रूप में हमारे सामने अवतरित तो हुए।
ऐसा लगा कि वाकई तुम तो आदमी हो!
सजीव,चिंतित,विचलित,मानवीय और मधुर।
पर.…।
काश तुम हमेशा ऐसे हे रहते ???
पर.…।
अब कहाँ देखने को या दीदार करने को मिलेगा तुम्हारा यह मनभावन रूप ?
किसी ने सही ही कहा है कि -
"मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं
अब तुम हमें जानते नहीं। "
पर चलो अपना ध्यान रखना -
गरीबों और मजलूमों को कभी सताना मत।
वरना -
कहीं ऐसा न हो जाये कि -
नेताजी अपनी गाड़ी से जा रहे थे ;पता नहीं क्या हुआ कि गाड़ी "डिवाइडर" पे चढ़ गई-
ड्राईवर तो बच गया पर नेताजी की रीढ़ की हड्डी खिसक गई।
और.....
अब नेताजी अपना शेष जीवन-
लेटे लेटे ही गुजारेंगे।
बिचारे बड़े ही अच्छे आदमी थे।
क्या करें -
"खुद कि लाठी चलती है तो
आवाज नहीं करती !"
आमीन !
शब्बा खैर !

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