Friday, November 8, 2013

पापा ! काश आप होते!




मेरे प्यारे पापा !
शानू के दुलारे पापा !

आज आपकी पुण्य तिथि है-

समाज में सबके लिये -ये पुण्य तिथि होगी  पर
मेरे लिए तो दुःख कि वो तिथि है
जो हमेशा मेरे जेहन में एक प्रश्न पैदा करती है कि -
आखिर क्यूँ ?
इतनी जल्दी क्यों ?
क्यों आप चले गए इतनी जल्दी-इस जहाँ से ?
जबकि आप रुक सकते थे  .......
यदि ईश्वर चाहता !

आपका जाना मेरे लिए था और आज भी है-

  • इक ममतामयी पिता का चला जाना। 
  • इक बरगद के पेड़ का असमय कट जाना। 
  • इक नौका का असमय भंवर में फंस जाना। 

और   ………

  • एक बसंती पौधे का रेगिस्तान में पहुँच जाना। 
आपके जाने  के अट्ठारह साल बाद भी  आज भी आप प्रासंगिक हैं-
  • सुबह कि पूजा में। 
  • सुबह के पुराने 'ब्लैक एंड वाइट ' गानों में। 
  • सुबह के जीवन संकल्पों में। 
  • घर में बनी उरद कि दाल में। 
  • सर्दियों में सुबह के भटे-मटर के भरते में। 
  • आलू के पराठों में। 
  • मेरी मोटर साइकिल ड्राइविंग टिप्स में। 
  • घर कि मंगोड़ियों में। 
  • घर कि सफाई में। 
  • पुरानी अलमारी में। 
  • पुराने बक्सों में। 
  • माउथोर्गन के सुरों में।  
और मेरी कलम में ,मेरी उँगलियों में। 

मुझे मालूम है कि -आप - 
  • मेरे जज्बातों में हो। 
  • मेरे सपनों में हो।  
  • मेरे भगवन में हो। 
पापा आप "मेरे" नहीं "अपने" घर के कण कण में हो। 
  • मेरी रग -रग में हो। 
  • अपने पोते -पोती कि नस-नस में हो और-
  • बहू की आस्था में हो ,कामना में हो प्रार्थना में हो।  
बस और क्या कहूं ?क्या लिखूं ?क्या सोचूँ ?
काश आप होते !
काश आप होते !
काश आप होते!



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