मेरे प्यारे पापा !
शानू के दुलारे पापा !
आज आपकी पुण्य तिथि है-
समाज में सबके लिये -ये पुण्य तिथि होगी पर
मेरे लिए तो दुःख कि वो तिथि है
जो हमेशा मेरे जेहन में एक प्रश्न पैदा करती है कि -
आखिर क्यूँ ?
इतनी जल्दी क्यों ?
क्यों आप चले गए इतनी जल्दी-इस जहाँ से ?
जबकि आप रुक सकते थे .......
यदि ईश्वर चाहता !
आपका जाना मेरे लिए था और आज भी है-
- इक ममतामयी पिता का चला जाना।
- इक बरगद के पेड़ का असमय कट जाना।
- इक नौका का असमय भंवर में फंस जाना।
और ………
- एक बसंती पौधे का रेगिस्तान में पहुँच जाना।
आपके जाने के अट्ठारह साल बाद भी आज भी आप प्रासंगिक हैं-
- सुबह कि पूजा में।
- सुबह के पुराने 'ब्लैक एंड वाइट ' गानों में।
- सुबह के जीवन संकल्पों में।
- घर में बनी उरद कि दाल में।
- सर्दियों में सुबह के भटे-मटर के भरते में।
- आलू के पराठों में।
- मेरी मोटर साइकिल ड्राइविंग टिप्स में।
- घर कि मंगोड़ियों में।
- घर कि सफाई में।
- पुरानी अलमारी में।
- पुराने बक्सों में।
- माउथोर्गन के सुरों में।
और मेरी कलम में ,मेरी उँगलियों में।
मुझे मालूम है कि -आप -
- मेरे जज्बातों में हो।
- मेरे सपनों में हो।
- मेरे भगवन में हो।
पापा आप "मेरे" नहीं "अपने" घर के कण कण में हो।
No comments:
Post a Comment