कटी पतंग कभी देखी है ?
कटने के बाद.……
बस उड़ती हुई.……
बिना रुके-बिना थमे.…
बस नीचे की ओर......
गिरती जाती है।
कोई छत उसकी नहीं होती।
कोई मुडेर उसे नहीं थामती।
बस गिरना उसकी नियति होती है।
बस गिरना उसकी प्रतीति होती है।
इस छत से उस छत.…
इस घर से उस घर......
इस दिशा से उस दिशा .....
इस डगर से उस डगर .......
बस-
गिरना और गिरना ....
नीचे और नीचे ……
पतित और पतित ....
पतन और पतन ……
हजारों हाथ नीचे …
उस गिरती हुई पतंग को-
लूटने के लिए।
नोंचने के लिए।
भोगने के लिए।
कोई नहीं उस पतंग को -
थामने के लिए।
सहेजने के लिए।
संजोने के लिए।
बस…
क्यों की तुम कटी हो तुम्हें -गिरना है।
क्यों की तुम फटी हो तुम्हें -गिरना है।
क्यों कि तुम हठी हो तुम्हें गिरना है।
पर ……
ऐ समय के काल चक्र!
मेरे वजूद पे शक न कर !
मै पतंग हूँ !
गिरने के बाद फिर उठना भी मेरी फितरत है।
बहती हवाओं के विपरीत उड़ना और उठना मेरी सीरत है।
आकाश में विचरना मेरी शोहरत है।
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