Sunday, December 29, 2013

इसी का नाम ज़िन्दगी है।

कैसे न जाने कैसे?
बीत गया वो वक़्त!
जब जीवन एक संगीत था!
मै किसी का गीत था!
और कोई मेरा मीत था!

हवा का बहना किसी को याद करने का पलके मूंद कर इक बहाना था !
पानी का बरसना किसी को किये वादों का निभाना था !
धूप का खिलना सपनों का सच होना था !
इंद्रधनुष का खिलना किसी का मेरे लिए संवरना था !
और.……
रात का आना सुबह का इंतज़ार होता था !

कैसे सारे मायने बदल गए।
कैसे सारे फलसफे बदल गए।
कैसे सारे ख्यालात बदल गए।
और-
सच मैं बदल गया।

बदलने चला था दुनियां को !
बदलने चला था प्रेम को-उसकी अगन को !
बदलने चला था अपनी लगन को!
और बदल गया मैं !

खैर कोई बात नहीं।
इसी का नाम ज़िन्दगी है।
जहाँ सिर्फ खुदा कि बन्दगी है।
और बाकी सब -सादगी है।




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