Thursday, August 15, 2013

एक शाम शहीदों के नाम -

एक शाम शहीदों के नाम -


सुनने में अच्छा लगता है
बोलने में अच्छा लगता है
और.…….
एहसास करने में -सुकून देता है कि -
चलो हमने अपना कर्तव्य निभाया और
दे दी अपनी श्रृद्धांजलि उन लोगों को
जिन्होंने कभी किसी ज़माने में
६७ साल पहले  ……
इस देश के लिए कुछ किया था।

असल में हम भूल गए हैं -उन  "कुछ लोगों की शहादत  " को !
और कहते -सोचते है कि -
ऐसा क्या किया था -उन लोगों ने ?जो हम उन्हें हर साल याद करें ?
ऐसा क्या दिया था उन लोगों ने ?जो हम उनका गुणगान करें ?
उनका तो यह कर्तव्य था -तो किया?
कोन सा बड़ा काम किया ?
हम होते तो हम भी करते ?

असल में हम बहुत अहसान फरामोश हो गए है -
देश के शहीदों की तो बात ६७ साल पुरानी हो गई  -
हम तो अपने पिता से भी कहने से नहीं चूकते कि -
आपने किया क्या है?
पैदा कर दिया तो -कोन सा बड़ा काम किया ?
पाला-पोसा  और पढाया?
वो तो आपका फ़र्ज़ था?
वरना  ……. क्या है?
ज़िन्दगी तो सभी जीते है ?
हम भी जी लेते !

वास्तव में  हम  नहीं जानते है कि -

  • देश के लिए "प्राणों" की आहुति देना क्या चीज होती है?
  • गोरों की गोली छाती पे खाना क्या होता था ?
  • अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना कितना बड़ा जुर्म होता था ?



और  …….

  • अपने सपनों को अपने देश के हित के लिए खंडित कर चूर -चूर कर देना क्या होता था ?


और  हमने बिसरा दिया है कि  -

  • सन ४७ में उन विधवाएँ को जिनमे  इक-चौथाई  से अधिक ने अपने पतियों को अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हुए खोया था। 
  • कि -उनकी चूड़ियों के टूटने पे भी क्रंदन होता था,सपने टूटते थे  और पिता बिछड़ते थे ?

और -

  • आंसूं उनके भी नहीं रुकते थे -वो भी इंसान थे -उनके भी जज्बात थे -उनकी भी आरजू होती थी -और उनके भी हमारी तरह दिल था -दिमाग था। 

पर। ……
अपने देश के खातिर -
उस समय की विधवाओं ने-

  •  चुडिओं को कांच समझा। 
  • पुत्रों ने पिता को शहीद समझा।
  • बहनों ने अपनी राखियों को समेट कर  अपनी मुट्ठियो में भींच लिया।
और

  • युवाओं ने अपने सपनों को -आज़ादी समझा !
आपको अहसास है कि -
युवा दिल उस समय भी धड़कते थे।  
युवा मन के सपने उस समय भी परवाज उड़ते थे।  
प्रेम के अंकुर उस समय भी फूटते थे। 
और.................. 

  • उस समय की वफाओं का जज्बा आज की वफाओं से कहीं बेहतर होता था!
  • उस समय की मोहब्बत रूहानी ताक़त होती थी -आज की युवा सोहबत नहीं!
और
  •  उस दौर के "सात फेरे" -'सात जन्मों' का 'बंधन' होता था -आज जैसा 'सात सालों' का 'मनमौजी' रिश्ता नहीं !
पर.……. 
मित्रों !उस दौर के अनाम लोगों ने 
अपने सारे सपने,सारी कसमें,सारे वादे,सारे बंधन निछावर कर दिए -
उस देश की आज़ादी के खातिर जिसे हम आज -"इंडिया" या "हिन्दोस्तां" कहते है !
आओ नमन करें उन्हें  ........ 
जिनके प्रयास से हम आज सांस ले रहें है-आजादी की। 

हे मेरे बिछड़े स्वतंत्रता सेनानियों!
चरणपादुका (सिंघपुर) के बलिदानियों!
शत शत नमन। 
शत शत नमन। 
नमन उस त्याग को। 
नमन उस बलिदान को।  




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