

"बहुत आसानी से,भारी मन से ,रोते हुए-सिसकते हुए-
हमने आपको-
वहीं पहुंचा दिया जहाँ की आप मुसाफिर थीं।
और बहुत दिनों से कह रहीं थीं कि -
हमें जाने दो -तुम लोग जाने नहीं दे रहे हो?"
"कितना कठिन होता है -
-यह कोई उनसे पूंछे जो अपनों को इक थेले में लेकर और गोद में बिठा के -
सदा सदा के लिए माँ गंगा के जल में सदा सदा के लिए प्रवाहित कर-
विदा-अलविदा कर देते हैं -अपने माँ-पिता को
और बस ....सब
पछ्ताते रह जाते हैं अपनी यादों के साथ,
अपने वादों के साथ ....
अपने बिछोह के साथ .".
"कल तक हम जिसकी गोद में खेल के बड़े हुए-
आज उसकी अस्थिओं को अपनी गोद में लेकर इलाहाबाद जाना-
और .......
माँ गंगा में प्रवाहित कर बिछड़ जाना-
हे भगवान .....
कुछ समझ नहीं आया?"
"ले आते हैं वापस घर .......
कुछ प्रसाद ....
कुछ यादें-
कुछ वादे -
कुछ दवाईयाँ -जाने वाले की- बची हुई;
और ....
कुछ सूखे हुए आँसूं
कुछ गुट्कता सा थूंक
और ......
कुछ वीरान आँखें-
कुछ स्याह रातें।
गूंजती रह जाती हैं -अपनों की आवाज़ और सुर -
जो बचपन में हमें -
सुलाते थे-बहलाते थे -मनाते थे;
लोरी की थाप से गाते थे और पीठ में-
खुजली कर के -
सुलाते थे।"
"कितनी विचित्र है ऊपर वाले की लीला-
इक जीता-जागता शरीर-
हो जाता है हमसे जुदा ...
और तब्दील हो जाता है ...
तस्वीरों के फ्रेम में ......
अपनी मालाओं के साथ .....
हमें सिर्फ रुलाने और सिसकाने के लिए??????"
आप बहुत याद आओगी अम्मा-
सदर चरण वंदन सहित-
आपके सारी -
नातिनें और नाती और आशीष /शानू !
..

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