एक छक्के सी हो जाती है -ज़िन्दगी!
जब....
अपनों के बीच-
तलाश हो मंच की...
वजूद की...
पहचान की..
या सुकून की!
कितना मुश्किल होता है - सम्भालना...
अपने आप को...
अपने संताप को...
और...
अपने अहसास को....
जब -
पटकथा के सारे पात्र -अपना ही साया हों???
याद आते हैं...
महाभारत के वे सारे पात्र भी...
जो-
भीष्म पितामह को आइना दिखाते थे..
और हर बात पर साबित करते थे-
उनको की - वे एक जंग लगी तलवार हैं और ....
शकुनि एक..
जीवंत पाठशाला....
या स्व.हरिवंश राय बच्चन की वो मधुशाला.....
जैसी बातें भी जहाँ -
मधु के गिलास;
जिनका वजूद मधु के खत्म होने तक ही था ...
बोतल से कह रहे थे-
की;
तुझमें सुरूर की कमी थी ; तभी
हमें कचरे में फेंक दिया गया...
सच!
कुछ कुछ बड़ी अजीब सी हो जाती है-ज़िन्दगी ;
जब...
अपने ही...
गले में रस्सी डाल कर कहते हैं- की -
कूदना मत...
कूदना मत...
फंदा कस जाएगा!
सच!
क्यों नहीं समझते अपने... अपनों को?
अपने.."अपनों के सपनों" को???
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