जो चले गए हैं -शहर
उनके फिर गाँव लौट के आने की आस न कर...
जो चले गए जड़ों से बहुत दूर... उनसे फिर जड़ों तक लौट आने की बाट न जोह!
वो जो गए थे बड़े आदमी बनने उनसे फिर गरीब बन पुरानी हवेली में वापस आने की क्यों करता है -आस?
रे मानव! बड़ी नश्वर है यह धन की प्यास.. इक बार जाग जाये फिर बुझती ही नहीं..
ये इंसान -कोई पंछी नहीं... जो सुबह रोटी की तलाश में उड़े और साँझ होते फिर उसी पेड़ के उसी घोंसले में लौट आये...
हाँ... जीवन की गौधूली बेला पे... गाँव की पक्की हो चुकी पुरानी पगडंडियों पे वो जरूर आएगा... अपने अतीत से रूबरू होने.. आँख मिलाने... और बताने की... वो व्यस्त था...ज़िन्दगी के धागों को पिरोने में...
बहुत धीरे से वहां भी नज़र दौड़ाएगा जहाँ पुराने शयन कक्ष में -दादा-दादी और अम्मा-बाबूजी टंगे छोड़ गया था... फोटो फ्रेम में जडे हुए.. कई दशकों के लिए.. धूल और मकड़जालों से दोस्ती करने को..
खैर...
काश तू समझ पाता -घर गाँव और घोंसले का मतलब...? और गाये की तरह रम्भाते हुए आ जाता अपनी जीवन गौधूली पे.. अपनी पुरानी दीवारों के आँचल में... नटखट गोलू या बबलू या श्याम या पप्पू बन... और फिर ढूंढने लगता अपने पुराने खिलोने.. सीपी कंचे और चिरंगे...
पर मुझे पता है की -तू क्यों आया है यहां?
"मुझ पुराने बीहड़ ज़िंदा मकान को बेचने आये हो? वैसे भी अब तुम्हें इस मकान की जरूरत कहाँ? तुम्हारा स्थान तो शहर के किसी वृद्धाश्रम में सुरक्षित है! "
(गर्वित गौरव!)
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