नंगे पाव चलता इन्सान को लगता है
.
कि "चप्पल होते तो कितना अच्छा होता"
.
बाद मेँ,
"साइकिल होती तो कितना अच्छा होता"
.
उसके बाद,
"मोपेड होता तो थकान नही लगती"
.
बद मेँ सोचता है
"मोटर साइकिल होती तो बातो-बातो मेँ
रास्ता कट जाता"
.
फिर ऐसा लगता है,
"कार होती तो धुप नही लगती"
.
फिर लगता है कि,
"हवाई जहाज होती तो इन ट्राफिक कि जंजट
नही होती"
.
जब हवाई जहाज मेँ बेठकर नीचे हरे-भरे घास के
मैदान
देखता है तो सोचता है,
कि "नंगे पाव घास मेँ चलता तो दिल
को कितनी तसल्ली मिलती"
.
.
""जरुरत के मुताबिक जिंदगी जिओ - ख्वाहिशों के
मुताबिक नहीं।
.
क्योंकि जरुरत
तो फकीरों की भी पूरी हो जाती है;
और
ख्वाहिशें
बादशाहों की भी अधूरी रह
जाती है""
'बुन्देली धमाका!'(गर्जना स्वाभिमान और आत्मबल की!) BUNDELI DHAMAKA...' समूचे बुंदेलखंड को एक मुखर मंच प्रदान करने का अभिनव प्रयास है 'बुन्देली धमाका' !हर चीज जिसका सम्बन्ध सुख-दुःख से हो अथवा भ्रष्टाचार-शिष्टाचार से हो या विकास-पतन से हो- यह ब्लॉग- महाराजा छत्रसाल की तलवार की भांति अपने उद्देश्य को पूरा करेगा!बुन्देली रिश्तों और उसकी सोच को नई परिभाषाओं मे बदलने का प्रयास करेगा यह मंच!पर्यटन और उसका आर्थिक प्रगति में योगदान सहित राजनीति तथा कूट नीति के असर पे भी हम बात करेंगे!!
Monday, December 15, 2014
हकीकत ज़िन्दगी की!
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