Monday, September 5, 2016

"पत्रकारिता !नहीं डगर .. पनघट की !"

पत्रकारिता विशुद्ध रहे तो बेहतर है वर्ना ऐसी पत्रकारिता नकारात्मकता की श्रेणी में ही गिनी जायेगी जहां व्यक्तिविशेष -पत्रकारिता का लबादा पहन कर अपनी सरज़मीं या जनसम्पर्क बढाने हेतु इस मार्ग पर चलते हैं !

कलम या पत्रकार का दायित्व जहाँ न्याय अन्याय को प्रत्यक्ष कर सत्य का नैसर्गिक मार्ग प्रशस्त करना है वहीँ यदि वह अधिकारियों के बगल में खड़ा हो फोटो सेशन करवाने लगेगा तो फिर उन्हीं के खिलाफ कभी समाचार छापने की स्तिथि में -क्या गारन्टी है कि उसकी कलम लड़खड़ाएगी नहीं ?

सनद रहे कि -पत्रकारिता की श्रेणी में वे लोग भी पलायन कर रहे हैं जिन्होनें अन्य व्यवसायों में काम करते हुए  महसूस किया कि -"यार यह चोला पहन कर तो कुर्सी और सम्मान दोनों मिलता है और बिज़नस भी द्रुत गति से चलता रहता है..तो क्यों न इस लबादे को धारण किया जाए और ज़िन्दगी में इस "फील्ड" का भी मज़ा लिया जाए !"

और इस तरह से अन्य
क्षेत्रों के परिंदे भी पतंग उड़ाने इस मैदान में उतर रहे हैं !

अब चूँकि यह भाईलोग विशुद्ध पत्रकार नहीं हैं तो यह मित्र गण "पत्रकारिता" को जरिया बना कर अपने क्षद्म आभा मण्डल का निर्माण करते हैं और फोटोसेशन करवा कर उसे सोशल मीडिया पर चस्पा कर साबित करते हैं कि - "यह सबसे बड़े धुरन्धर धनुर्धर हैं ; और अंततः हमें आपको इन्हें इनके ही ओजस्वी रूप और शैली में स्वीकार करना पड़ता है!
नए लोगों का इस क्षेत्र में स्वागत है एवम यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार भी है !बस दिक्कत तभी होती है जब अति महत्वाकांछायें करवटें बदलतीं हैं और "प्रेस और मीडिया" का स्टीकर लगा कर अधिकारियों के बीच पैठ बना कर लोग लाभ की अपेक्षा करने लगते हैं !

जरूरत है कि -ऐसी प्रजातियों की आमद इस क्षेत्र में रोकी जाए अथवा कुछ दिन इन्हें भी "तपाया" जाए जिससे जब यह निखर कर अपनी सम्पूर्णता को प्राप्त करें तो इन्हें अहसास हो की -"यह डगर पनघट की नहीं थी और पेन से लिखना इतना आसान भी नहीं होता है !"

वैसे भी जबसे मोबाइल और कंप्यूटर और उसके कीबोर्ड का ज़माना आया है ...
यथार्थ में -अब कलम के वे जुझारू पत्रकार बहुत ही कम रह गए हैं -
जो अपनी विलोपित होती प्रजाति का झंडा ऊपर किये हुए चल रहे हों !
फिर अब कलम से लिखता भी कौन है ?
वह तो अब सिर्फ दस्तखत करने के लिए ही ...
ज़िंदा रह अपनी अंतिम साँसे गिन रही है !
जबसे "डिजिटल सिग्नेचर" के बारे में -"कलम" ने सुना है ...वह बिचारी और भी मायूस हो गई है की भविष्य में उसका हश्र भी -"टेपरिकॉर्डर और कैसिट जैसा होने वाला है !"
यह तो प्राकृतिक सिद्धांत है कि -समय के साथ साथ सब कुछ बदलता है !
चलो धीरज धरें इन शब्दों के साथ कि -
पलायन कर पत्रकारिता रूपी
टापू पर घूमने आये यह बंधु एक दिन वापस अपने किसी अन्य नए घर ( फील्ड ) लौट जाएंगे और पत्रकारिता अपने प्रतीकों के साथ निर्बाध गति से चलायमान रहेगी !
"सत्य हताश है ;पराजित नहीं !"
[लेखक के विचार अपने हैं एवम यदि किसी को शब्दों और उसके मायनों से दुःख पहुंचे ;तो "कर" बद्ध खेद एवम क्षम्यता प्रदान करें !]

No comments:

Post a Comment