Saturday, September 10, 2016

राष्ट्रवाद एक जीवनशैली !

डीडी न्यूज़ में एडिटर मेरे सीनियर परम् आदरणीय अग्रज श्री प्रकाश पन्त द्वारा अपने फेसबुक पेज पर प्रकाशित / लिखित कथन एवम विचारों के परिप्रेक्ष्य में ;मेरे "राष्ट्रवाद" पर विचार !
------------------------------
From the pen of Shri Pant!
"जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर से एन डी टी वी पर छात्र संघ चुनाव की खबर देखकर आंखें खुल गई। छात्रों के बीच बहस आयोजित की गई थी। ए बी वी पी को छोड़कर सभी लेफ्ट , समाजवादी, दलित मुस्लिम गठजोड़ वाले संगठन के नेता खड़े थे- रोहित वेमुला से लेकर किसानों क हालत पर जोश भरे आख्यान दे रहे थे, जैसे ही ए बी वी पी की प्रतिनिधि ने राष्ट्रवाद की बात की,  तो एंकर लगभग भड़क सी गई और माइक लेकर चारों और दौड़ने लगी, बताइए राष्ट्रवाद कोइ मुद्दा है? सर किसी के पास जाकर पूछने लगी और फिर लगभग उपहास के लहजे में नतीज़ा घोषित कर दिया राष्ट्रवाद कोई मुद्दा नहीं -- अब समझ नहीं आया कि राष्ट्रवाद से इतनी कोफ्त क्यों?"
------------------------------
At last ...My Views!
राष्ट्रवाद एक जीवनशैली !
मान लिया कि राष्ट्रवाद कोई मुद्दा नहीं। वह मुद्दा हो भी नहीं सकता। राष्ट्रवाद एक जीवन शैली है जिसे इस पुरे देश ने अंगीकृत किया हुआ है।
"हिंदुस्तान में रहना होगा वन्देमातरम कहना होगा" ; जैसे नारों के मर्म में यदि यदि राष्ट्रवाद ढूंढोगे तो राष्ट्रवादियों को अवश्य मिल जाएगा परंतु अन्य को उसमें - फांसीवाद ,संघवाद ,अराजकता और भी न जाने कौन कौन  से वाद नज़र आ जाएंगे।
ठीक है आप -"हिंदुस्तान में रहना होगा वन्दे मातरम कहना होगा !" ; मत कहिये परंतु -भारत वर्ष की जय हो ! तो बोल देंगे ? के इसमें भी आपकी इज़्ज़त घटती है और -राष्ट्रवाद की बू आती है?
एनडीटीवी का फुल फॉर्म जहाँ -" New Delhi "शब्द से शुरू होता है वहीँ
एनएसयूआई का फुल फॉर्म -"नेशनल" शब्द से शुरू होता है।
एबीवीपी का फुल फॉर्म भी -"अखिल भारतीय" शब्द से शुरू होता है।
तो NDTV को हम -New Delhi ही माने वहीँ अन्य छात्र संगठनों को हम "राष्ट्रवाद" से प्रेरित ही मान के चलें।
वास्तविकता यह है कि -"राष्ट्रवाद" के दम पर  भाजपा केंद्र की सत्ता पर है एवम राज्यों में भी बढ़ती जा रही है। वहीँ अन्य पार्टियां "राष्ट्रवादी" होते हुए भी इस मुद्दे से दूरी इसलिए बनाये हुए हैं क्योंकि अब यह मुद्दा -भाजपा का ब्रांडेड मुद्दा हो गया है।
न चाहते हुए भी बहुत से लोगों को सिर्फ भाजपा की मुखालफत करने के लिए -राष्ट्रवाद की खिलाफत करनी पड़ती है।
दिक्कत यह है कि -कोई भी खुल कर राष्ट्रवाद के विरोध में इसलिए नहीं बोल सकता क्यों की -यह उतना ही कठिन काम है जितना कि -सूरज को आँखें दिखाना या माँ -पिता से -"आप की जगह तुम का सम्बोधन करना। "
समाजवादी से दलित और रोहित वेमुला सभी मुद्दे हैं परंतु जब "राष्ट्रवाद की बात चल निकलती है तो यह सभी थोड़े कमजोर और फीके पड़ जाते हैं।
डार्विनवाद के सिद्धांत के अनुसार -"अंत में केवल वहीँ पार्टी रह जायगी जो संघर्ष करेगी और समय के साथ अपने आप को बदलेगी। "
अब फतवे या आरक्षण की आग वाले युवा भी सुशिक्षित हो रहे हैं और वे अब तुलनात्मक अध्ययन करके ही कोई निर्णय लेते हैं।
फिर चाहे भाजपा का राष्ट्रवाद हो या कांग्रेस का राष्ट्रवाद हो या समाजवाद का राष्ट्रवाद  ..... आखिर में सारे वाद १५ अगस्त को लाल किले में खड़े हो कर -"जन मन गन अधिनायक जय हो  .... " तो गाते ही हैं न ? वह भी सावधान की मुद्रा में ?
ऐसे बहुत से चैनल आएंगे और चले जाएंगे  .... बहुत से एंकर चकरघिन्नी सा घूमेंगे लेकिन उससे हमारी -भारतीयता को असर नहीं पड़ता है।
इन सबके लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि -एक ऐसी पार्टी सत्तासीन हो गई है जिससे अब इनका दिल्ली जाना और अपनी शर्तों पर जीना थोड़ा सा विकट हो गया है और कुछ नहीं।
आज भी हम जेएनयू में  बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं क्योंकि -वाकई वह देश का सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में से एक है और ईश्वर करे वह बना रहे।
(गौरव !)

No comments:

Post a Comment