Thursday, September 1, 2016

ज़िन्दगी की फरमाइशें ; बेहिसाब !

अब न ख्वाइशें रह गईं हैं ;
न ख्वाब ...
बस बच्चों की फरमाइशें ..
रह गईं हैं ;
बेहिसाब !

पर मेरा जीवट भी है-
लाजवाब ....
फरमाइशों को ...
पूरा करते करते ...
जलता जा रहा है ....
मेरी ज़िन्दगी का ..
मेहताब !

ज़िन्दगी के बूचड़खाने में ...
रोज़ बनता है ..
मेरा कवाब !

मैं भी झोंक देता हूँ ..
अपने लहू का ..
आखिरी कतरा तक ..
इस इल्तिज़ा से ...
कि कुछ ऐसा ...
जायका ज़िन्दगी का ..
दे जाऊं ...
अपने बच्चों को ...
कि कभी वे भी ...
जब टूटते तारों को
निहारें तो ...
बरबस होंठ ..
बुदबुदा उठें कि -
"उनके पापा भी थे ;
आफताब !

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