मगर रोज़ ..
उगती सुबह की मानिंद ..
बच्चों की भूंख बन ..
उनके ख्वाब बन ..
तुम बार बार ..
आ धमकती हो ..
मेरे मृतप्राय वज़ूद में !
उगती सुबह की मानिंद ..
बच्चों की भूंख बन ..
उनके ख्वाब बन ..
तुम बार बार ..
आ धमकती हो ..
मेरे मृतप्राय वज़ूद में !
और ; बेशर्मी से -
मैं पुनः जी उठता हूँ ..
तेरे तिलिस्म की आग में ..
और ..पुनः जुट पड़ता हूँ ..
कुछ कर गुजरने की खातिर ..
जबकि ..
ये पक्का पता है कि -
अगली शाम को ..
फिर मरना है !"
मैं पुनः जी उठता हूँ ..
तेरे तिलिस्म की आग में ..
और ..पुनः जुट पड़ता हूँ ..
कुछ कर गुजरने की खातिर ..
जबकि ..
ये पक्का पता है कि -
अगली शाम को ..
फिर मरना है !"
[शानू !]

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