Thursday, August 24, 2017

गंतव्य @६०

"पहुंचने वाला हूँ ;
मैं भी साठ पर!

गौर करूँगा ...
जीवन में पढ़े ...
हर इक पाठ पर !

कभी ...
सूर्योदय का ..
नमन किया था !
अब सूर्यास्त का ...
गमन करूँगा !!

मुझे पता है ...
यह जीवन चंचल !
सदा मचाता रहता ...
हलचल !
पलपल उसमें होता ... कलकल!
फिर भी मेहनत ...
नहीं होती ..

निष्फल !
[SHANU!]

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