"चाँद की शीतल हवा और ..
ये बहती पुरवाई !
मेरा ढलता कुम्हलाता ...
स्पंदित निर्लजः यौवन और ..
सौगात में -
तुझसे मिली ये तन्हाई !!
उस पर ...
बार बार उचट कर ..
तेरी तरफ जाता मन ;
जैसे तूने हों फिर ...
मेरी जुल्फें ...
अभी अभी ;लहराई !!
ये बहती पुरवाई !
मेरा ढलता कुम्हलाता ...
स्पंदित निर्लजः यौवन और ..
सौगात में -
तुझसे मिली ये तन्हाई !!
उस पर ...
बार बार उचट कर ..
तेरी तरफ जाता मन ;
जैसे तूने हों फिर ...
मेरी जुल्फें ...
अभी अभी ;लहराई !!
कितनी बार ...
मन-मंदिर और मुरादों को ..
बता चुका हूँ कि -
अब मैं 'मुक़म्मल' आदमीं हूँ!
कोई ...
अपने 'वज़ूद' को ...
तलाशती परछाईं नहीं ;
जो हर चूड़ी में ...अपने लिए ...
खनखनाहट और
बिंदी में प्यार ..
तलाशते फिरे !!
मन-मंदिर और मुरादों को ..
बता चुका हूँ कि -
अब मैं 'मुक़म्मल' आदमीं हूँ!
कोई ...
अपने 'वज़ूद' को ...
तलाशती परछाईं नहीं ;
जो हर चूड़ी में ...अपने लिए ...
खनखनाहट और
बिंदी में प्यार ..
तलाशते फिरे !!
लेकिन ;
यह मानव मन भी न ..
बिलकुल बेशर्मी की ..
इन्तिहाँ है!
यह मानव मन भी न ..
बिलकुल बेशर्मी की ..
इन्तिहाँ है!
भूल कर भी ...भूलता नहीं !
और कभी कभी ...
याद कर के भी ...मिलता नहीं !!
और कभी कभी ...
याद कर के भी ...मिलता नहीं !!
जब छलकना हो तो ...
छलकता नहीं और ...
कभी बिछड़ना हो तो...
बिछड़ता नहीं !
छलकता नहीं और ...
कभी बिछड़ना हो तो...
बिछड़ता नहीं !
लेकिन ;
यही ज़िन्दगी है !
जिसे भूलना है ...वह भूलता नहीं !
जिसे याद करना है ....वह करता नहीं !
यही ज़िन्दगी है !
जिसे भूलना है ...वह भूलता नहीं !
जिसे याद करना है ....वह करता नहीं !
जिसे खोना है ....वह पाता है !
और पाने वाला ;खोता !
और पाने वाला ;खोता !
ज्वार-भाटों की मानिंद ..
उतराता रहता है ..
यह जीवन तिलिस्म !
कभी उन्माद बन ...
तो कभी फसाद बन !!
उतराता रहता है ..
यह जीवन तिलिस्म !
कभी उन्माद बन ...
तो कभी फसाद बन !!
और यही कुछ पल ..
तन्हाई में ..रुलाते हैं ..
बिन आसुओं के !
तन्हाई में ..रुलाते हैं ..
बिन आसुओं के !
आज जाना कि -
इतनी रात गए...इतने बरस गए ..
ऊपर छत पे ...
तुम कैसे आ धमकी ...
होले होले से ..
बिन आवाज़ और ..मैं ;
रोक भी न पाया ...
तेरा वही ..
पुराना बेफिक्र अंदाज़ ??
इतनी रात गए...इतने बरस गए ..
ऊपर छत पे ...
तुम कैसे आ धमकी ...
होले होले से ..
बिन आवाज़ और ..मैं ;
रोक भी न पाया ...
तेरा वही ..
पुराना बेफिक्र अंदाज़ ??
चल ...
कश्तियों के लौटने का ..
समय हो गया है !
पलकें ...
चप्पू चलाने लगीं हैं और ..
तेरी छत से ..
उठी हवाएं भी अब ..
थक कर ..
मंद पड़ने लगीं हैं !
कश्तियों के लौटने का ..
समय हो गया है !
पलकें ...
चप्पू चलाने लगीं हैं और ..
तेरी छत से ..
उठी हवाएं भी अब ..
थक कर ..
मंद पड़ने लगीं हैं !
फिर किसी दिन ..
जब बच्चे सो जाएँ तो ..
उन यादों की मुडेरों पर ..
गुफ्तगूं करने ऊपर ..
जरूर चली आना !
जहां हम दोनों ..
सैकड़ों बार ..टूटते तारों के ..
साक्षी बने थे !!
जब बच्चे सो जाएँ तो ..
उन यादों की मुडेरों पर ..
गुफ्तगूं करने ऊपर ..
जरूर चली आना !
जहां हम दोनों ..
सैकड़ों बार ..टूटते तारों के ..
साक्षी बने थे !!
शुभ रात्रि !!
(GARVIT GAURAV!)

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