"ऐ मेरी ज़िन्दगी की -
शरद की रुपहली धूप!
ग्रीष्म की ठंडी ब्यार!
बसंत के प्लाश की केसरिया सोंधी धूल !
और सावन की कलकल बहती जलधारा !
बस ..सदा ..यूँ ही तुम ..
प्रकृति बन ..
रची बसी रहना ..
मेरी लकीरों में ..
कई कई जन्मों तक और ..
शरद की रुपहली धूप!
ग्रीष्म की ठंडी ब्यार!
बसंत के प्लाश की केसरिया सोंधी धूल !
और सावन की कलकल बहती जलधारा !
बस ..सदा ..यूँ ही तुम ..
प्रकृति बन ..
रची बसी रहना ..
मेरी लकीरों में ..
कई कई जन्मों तक और ..
सम्प्रेषित करती रहना ..
अपना वज़ूद ..
आभा,शक्ति और ..
चिर दायनी लक्ष्मी का हमरूप मंदाकनी बन ..
मेरे कई भवसागरों की अनादि यात्रा में !
और क्या कहूं और लिखूं ?
तुम तो स्वयं एक 'जीवन' हो !
'वृतांत' होता तो लिखता !
'जीवन' तो सिर्फ 'जीवन' है जो 'लिखा' नहीं ..
अपना वज़ूद ..
आभा,शक्ति और ..
चिर दायनी लक्ष्मी का हमरूप मंदाकनी बन ..
मेरे कई भवसागरों की अनादि यात्रा में !
और क्या कहूं और लिखूं ?
तुम तो स्वयं एक 'जीवन' हो !
'वृतांत' होता तो लिखता !
'जीवन' तो सिर्फ 'जीवन' है जो 'लिखा' नहीं ..
अपितु
'जिया' जाता है !
मेरी इस यात्रा की .. सहयात्री!!
तुम्हें जन्मदिवस की ढेरों शुभकामनाएं !!
(शानू !)
'जिया' जाता है !
मेरी इस यात्रा की .. सहयात्री!!
तुम्हें जन्मदिवस की ढेरों शुभकामनाएं !!
(शानू !)

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