हक़ीक़त में-
'पिता' कभी ख़त्म नहीं होते !
खामोशी का लबादा ओढ़ ..
जुदा नहीं होते !
बस 'अंतर्ध्यान' हो जाते हैं; वो...
'ईश्वर' के वास्ते ..
और हम ..मान लेते हैं ;
उनका गुज़र जाना !
उनके न दिखने के बावजूद ..
वे अपनी खामोशियों के साथ ..
सदैव चलते रहते हैं ..
अपने बच्चों के इर्द गिर्द !
और बच्चे भी ..
अनुगमन करते रहते हैं ..
उन दिशाओं का ...
जो उनके पिता ने ...
चित्रित और चिन्हित की थीं !
गौर से सुनोगे तो ..
वे सारी कहानियां ..
मूर्त हो ..
पथप्रदर्शित करती दिखाई देंगीं ..
जो जीवन अमृत सा ..
तुम्हें सुना गए हैं ;
अपने प्यारे पिता ...
अपने अनुभवों का निचोड़ समझ !
समझ सको तो ..समझ लो !
जान सको तो ..जान लो !
पिता कहीं नहीं जाते !
वट वृक्ष बन ..
अपने बच्चों को ..
सदा सहलाते !
बस ...
रूप बदलने को ...
प्रकृति और मौसम जैसे ...
अदृश्य हो जाते !
(शानू और आशीष !)
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