"ऐ सफेदपोश इंसा !
उड़ जाएगा तू भी ..
राख की तरह
एक दिन ..एक पल में ..
जब वक़्त ..
रुखसती का आएगा !
किस हैसियत से ..
तू इतरा रहा है ..
इस दुनियाँ में ?
जब कि ..
तेरी औकात ..
इतनी भी नहीं कि -
नसीब हो मौत
तिरंगे से लिपट कर !
खद्दर के ..
कुर्ते और पजामे में ..
तू सोचता होगा ..खुद को ..
गरीबों का रहनुमाँ पर
हक़ीक़त में तू ..
वो दीमक है -
जिसका बस चले तो ..
इस देश को भी ..
कुतर जाए !
अक्सर ..
रात के रतजगों में ..
सीमा पर ..
तेरे जैसे गद्दारों को ..
तकते और भूँजते हुए ..
याद आ जाता है ; तू ..
आलिशान मकां के ..
आलिशान सोफे पर ..
लुढ़का हुआ सा और
मन खटास से ..
भर जाता है !
कभी कभी तो ..
मन कहता है कि -
तुझसे कह ही दूँ कि ..
अगर कभी ..
ख़ाक ऐ वतन हो जाऊं तो ..
मेरी मिटटी पर ..
फूल न चढ़ाना !"
"तेरे फूलों से ..
मेरी कुर्बानी ..
व्यर्थ न हो जाए !"
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