Friday, September 8, 2017

सैनवा के भरत अभिमन्यु !

"चलो युवराज भवन के 
उस मोड़ से ..
फिर से ‪शुरू करें; 
जिन्दगी‬ !
जहाँ हर ‪‎पल‬ हसीन था .. और ..
हम तुम थे ..
इक अजनबी !!"

तुम एक 'अभिमन्यु' थे 
और 
मैं सिर्फ 'भरत' !

तुम अभिमन्यु की ..
गुलाबी लिपस्टिक थे !
और हम ..
भरत के बेंगनी फूल !

चाय की केतली के ..
'खट' की आवाज़ से ..
भाग जाती थी ...
नींद सारी ...और 
ज़िन्दगी दौड़ पड़ती थी .. 'क्रॉस कंट्री' करने ...
सिविल लाइन्स ..बोदा बाग़ ..साहू शॉप से स्टेडियम तक के ..
चौबारों में !

कुछ ऐसी थी ..
अपनी ज़िन्दगी ..
युवराज भवन के ..
बड़े बड़े गलियारों में !

छोटे थे न ..
कभी आंसू पोंछ लेते थे .. 
युवराज भवन की दीवारों में! 
तो कभी कभी ..
खुशियां समेट लेते थे ..
छोटे छोटे ..
तीज त्योहारों में !

कुछ ऐसा था ..
बचपन अपना ..
भरत अभिमन्यु की ..
चौपालों में !

गिलास की चाय में ..
डूब जाता था ..बिस्किट !
और नानखटाई थी ..
आज की ..
पित्ज़ा और बर्गर !

गले की एक डोर से ..
लटकी रहती थी ..
उस संदूक की चाबी ..
जिसके अंदर ..
माँ के हाथों की गुझिया ..
बुझा देती थी ..
घर की यादें और ..
पापा के ..
जल्दी आने के वादे !

गुज़र गया वक़्त ..
फूटबाल मैच की तरह !
और ..
ज़िन्दगी की जद्दोजहद में ..
संघर्ष और जय-विजय के शंखनादों के ...
उत्तरार्ध में ..
रह गईं ..
हमसभी की ..
धुंधली यादें ;
कभी न ..
बिसरने के लिए !

बहुत कुछ है ; दोस्तों ..
ज़िन्दगी में !
या ये कहो ..
सब कुछ है ज़िन्दगी में !

पर एक बात कचोटती है ..
रोज़ ;
हम तुम ..
अब साथ नहीं हैं ; 
ज़िन्दगी में !"

[GAURAV!]🍃🍂🙏🍃🍂

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