Saturday, July 16, 2016

जीत चाँद की!

चाँद और चकोर !

देखना ! आखिर में ...
जीत चाँद की ही होगी !

अपनी मध्यम रौशनी की बदौलत !
चाँद की चांदनी ....
अँधेरे में ...
रोशन करेगी ...
उन ख़्वाबों को मुकदस जमीं ...
जो सुलगते रहते हैं ;
अक्सर दिन की तीखी रौशनी में ...
और
डूब जाते हैं ..
शाम ढलते ढलते !

ज़िन्दगी की -
सुलगती रातें ...
तपती दोपहरियां और
ढलती शामों ..
में ही तो ;
सिमट जाती है ..
इक इंसा की ..
पूरी कहानी !

कैसी है न
ज़िन्दगी की ...
अबूझ अनसुलझी ...
समय की घडी ?
बिलकुल उलटी चलती है !

जीवन साथी के साथ ...
पहले महकती रातें !

फिर परिवार बढ़ने पर ...
पसीने से लथपथ ..
दुःसाध्य दोपहरें !

और सांझ में ...
थकी हारी ...
ज़िन्दगी की ढलती ....
गौधूलि बेला की ....
गुमनाम शामें !

फिर -
आखिर में -
जीवनसाथी के ...
बिछुड़ने पर ..
अकेली ...
निशब्द ...
कराहती रातें !

इक चाँद ही तो है जो ...
अक्सर झुठला दिया जाता है ...
रौशनी की चर्चाएं होने पर ...
और ...
सुरज ले जाता है ..
बाज़ी ...
प्रकाश की !

पर ..
जब ज़िन्दगी का पहिया ....
टूटता है ...
और चलती गाडी ...
अपनी ही औलादें ....
कबाड़ में टिकाती हैं ...
और
"दिशा अथवा निस्तार" ...
जाने को ....
जब मोतियाबिंद से ....
आँखें जवाब देने लगती हैं .. और ...
औलादों की टौर्चों में ...
सेल नहीं होते हैं .....
तब
चाँद ही ...
सहारा बनता हैं ..
प्रकाश पुंज का और
देता है ...
जीवन को रौशनी और सहारा !

देखना ...
आखिर में ...
सीधासादा चाँद ही काम आएगा !
और फिर भी ...
ज़िन्दगी ....
गाती रहती है ..
सूरज की तारीफों के पुल ..
सदैव ..
दोगली बन के !

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