"बदस्तूर जारी है -
ज़िन्दगी से ....
रोज़ रोज़ की ...
नोंकझोंक और जंग !
साबित करती है वह ;
हर सुबह ....
मेरा निकम्मापन ....
और पिछले चालीस बरस का ...
रिपोर्ट कार्ड ...
हाज़िर कर देती है ...
रोज़ नाश्ते की टेबल पर ...
और ढकेल देती है मुझे ...
बहुत नीचे ...
अनंत गहराईयों में ...
फिर ऊपर न आने के लिए !
मैं भी ...
पूंछ कटे सांप की तरह ...
बेशर्मी से ...
बिलबिलाता हुआ ...
निकल आता हूँ ....
ज़मीन की खंदकों से बाहर ..
दो दो हाँथ करने को ...
उन पत्थरदिलों से ...
जो उकता रहे हैं ...
मेरी नाकामी की ...
खबर सुनने को !"
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