बारिशें !!!
बरस कर चलीं गईं !
और
पीछे छोड़ गईं ...
कुछ खिलते ख्वाब ...
कुछ सुलगते अरमान और
उड़ने को ...
खुला नीला आकाश !
बारिशें ...
अक्सर कुछ टीस भी ...
छोड़ जाया करती है !
कुछ उखड़ी साँसें ..
कुछ अनकही बातें ...
कुछ यादों की कतरनें ...
तो
कुछ सिकुड़े सलवटों से भरे बिस्तर और उसकी ...
किनारियों पर ....
सोख्ता बने तकिये पर ...
आंसू की चन्द बूँदें !
अक्सर बारिशें ....
अपने पीछे छोड़ जातीं हैं ...
घर की दीवारों से ...
कुछ टपकती हुई बूंदें ...
और
कुछ पिताजी के द्वारा .....
बनवाई गई ...
गाँव के घर की छत से ...
टपकता पानी !
कुछ सीलन सीलन सी ...
अज़ीब सी बदबू ...
सच !
बारिश के बाद ...
अक्सर घबराहट सी ...
हो जाती है ....
पुराने पुरखों के ज़माने के ....
खस्ताहाल मकान देख कर!
सच कभी कभी ...
बारिश बाद के खर्चे भी न ...
परेशान कर देते हैं ...
और मज़बूर कर देते हैं ...
सोचने को ...
कि इन चाहरदीवारियों को बनवाने वाले भी न ....
कितने जुनूनी थे ?
कितना प्यार करते थे ...
हमसे न ?
जो इन गावों में भी ...
छोटा मोटा घोंसला तो बना ही गए ....
हमारी खातिर और
जिसे हम आज नहीं तो कल बेंच ही देंगे ....
अपने बेटे को ....
कोटा में कोचिंग ...
कराते वक़्त !
बारिश कुछ नहीं ...
बस स्पंदन है .....
ज़िन्दगी का !
जहां प्यास थी ..
वहाँ तृप्ति है !
जहाँ बंज़र जमीन थी ...
वहाँ बहार है !
और
जहां अतिवृष्टि हो गई ...
वहाँ अब दलदल है !
इंसानी रिश्तों में भी ...
जब बारिश आती है तो
बहुत कुछ .....
अज़ीब अज़ीब सा होता है !
फिर हम ....
इंसानों के लिए तो ..
बारिश का मतलब ....
सिर्फ "पानी" नहीं होता बल्कि ...
मोहब्बत की बारिश ....
सम्पन्नता की बारिश ...
सुकून की बारिश या
दुआओं की बारिश
की भी ....
अपनी अपनी ...
अहमियत और
जिहीनियत है !
जिसने इन बारिशों के .....
तटबन्धों और अल्फ़ाज़ों को .. ..
पढा और समझा .....
वह तो ....
खुश है और
वहीँ कुछ लोग ....
बारिश के दलदल में फंस कर ....
ईश्वर को दोषी मानते रहते हैं !
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