"हे राम!
कैसे मारूं अपने अंदर के रावण को... जब
देखता हूँ -की
राम तो क़ैद हैं ; चाहरदीवारी में... और
भुगत रहे हैं...
अनचाहा कारावास...
वहीँ -
रावण जी रहे हैं -उन्मुक्त, बेपरवाह और बेखौफ... ज़िन्दगी...
निर्लज्झता के साथ...
वो भी दम से -
और हैं -विराजमान...
तख्तेताऊस पर...
बिलकुल वैसे
जैसे तुम भी कभी बैठते थे..
अयोध्या के राजदरबार में.... राजन बन!
इस युग में...
कितनी सार्थक रह गई है -राम भक्ति???
हर बार..
क्यों जीत जाता है -रावण?
और
हार जाते हैं -राम?
क्यों डर लगने लगा है -
राम शब्द के उच्चारण में?
कहीं दो समुदायों की शांति भग न हो जाए..
'राम' शब्द से... और
लगाना पड़े...
कचहरियों के चक्कर..
जमानत की खातिर!
हे राम!
बहुत डर लगता है ;तुम्हें पुकारते हुए अब...
तुम्हारे ही देश में..
रावण! बलात् ; पर बाइज़्ज़त बरी?
रावण! दंगाई ; पर बरी?
रावण! भ्रष्टाचारी ; पर बरी?
रावण! हिंसक ; पर बरी?
और राम!
मेरे राम!
तुम कौन हो और किस अपराध में..
इतने सालों से..
हो अंदर..
और कब तक होगी..
तुम्हारी जमानत?
सब कहते हैं -की
यदि मैं रावण बन जाऊं या...
दोस्ती कर लूँ..
रावण, शूर्पणखा या मेघनाद से...
तो बाहर आ जाओगे तुम
अपने कारावास से..
तुमने विभीषण से मित्रता की थी
उस समय वही उचित था....
तो फिर...
मैं आज! रावण से मित्रता करता हूँ...
इस समय ;यही उचित है!
हे राम!
क्या मैं रावण बन जाऊं?
तुम्हारी खातिर?
तुम्हें न्याय दिलवाने की खातिर?
बोलो राम! "
(गर्वित गौरव! )
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