सफर तो काफी तय कर लिया था ;
हमने -
प्यार में चलते चलते ....
प्यार में मिलते मिलते ....
और
प्यार में बिछड़ते बिछड़ते ....
धुप छाँव और बादलों का सफर ...
कस्मे वादे और यादों का सफर ...
रीत रिवाजों का ऊँच नींच वाला सफर और
हंसी ख़ुशी मिलने और बिछड़ने का
सबसे लम्बा सफर।
मंदिरों में मन्नत मांगने का सफर ...
चादर चढ़ाने का सफर ....
झोली फ़ैलाने का सफर और -
व्रत उपवास के साथ चालीस बीवी की कहानी ;
सुनने का सफर।
रात रात भर जाग कर ... जागने का सफर ...
रात रात भर आंसुओं से दरिया .... भिगोने का सफर ....
आधी रात को बेफालतू में तेरी फोटो को ....
बिंदी लगाने का सफर ....
और
तेरे को गुस्से में फाड़ कर फेंक देने का सफर ....
पर
फिर धीरे से तेरी कतरनों को बीन कर ...
पुनः तेरा अक्स बनाने का ...
सफर।
इतना सब कुछ करने के बावजूद ...
कुछ ख़ास मिला भी तो नहीं।
तू निकल गई अपने सफर और -
मैं चल निकला बिना हमसफ़र।
बस लम्बा सफर ...
तेरे बिना ...
खाली खाली ...
सिफर सिफर ....
फिर मिला अगला पड़ाव।
इंतज़ार करता ...
इक गहरा भंवर।
समेट लिया उसने -
मेरा सारा शहर।
उसने थामा मेरा सफर ....
ऐसे जैसे -
वही हो कोई मेरा -
बाजूबंद और पूरा जीवन प्रहर।
खो गया पूरा वज़ूद मेरा ....
उसके आगोश में ;कुछ ऐसे -
जैसे -उड़ते बादल ने समेट ली हो -
पूरी उन्नत नुकीली हिमाद्रित चोटी -
अपने बख्तरबंद लिबास में।
हाँ।
कभी कभी
अब भी याद आ ही जाती हो
पुराने मंदिरों में ...
पुराने देवी-देवताओं के सामने ....
तो कभी -
किसी कॉलेज जाती लड़की की किताबों में ...
तो कभी किसी डरी सहमी झिझकती आँखों में ...
पर चलो फिर बन जाएँ-
पथिक।
और छोड़ दें अपना वो-
कुछ अंतराल का ...
जीवन सफर।
तुम सजदा करो -साथ में अपने हमसफ़र ....
और
हम सज़दा करें ;साथ में --
अब जो है ;
मेरा हमसफ़र।
(गर्वित गौरव !)


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