गुमशुदा की अरज!
आज भारतीय लोकतंत्र मिल गया मुझे...
पटना की सड़कों में...
थोड़ा घबराया सा.. सकुचाया सा...
शरमाया सा था...
बदहवास...
हर आने वाली बस से पूँछ रहा था की...
क्या ये बस दिल्ली जाती है?
मैंने भी उसकी पींठ को थपथपाकर पूंछा...
यहां कैसे???
इतना सुन कर बिलख कर लिपट गया मुझसे...
कहने लगा -
बचा लो मुझे...
ये लोग मुझे अपहृत कर के ले आये हैं... यहां...
कह रहे हैं -
अब पांच साल हम ही- तुम्हारे माई बाप हैं...
औकात से रहना...
वरना....
मैंने समझाया की -
घबराते क्यों हो?
तुम लोकतांत्रिक रूप से चुन कर आये हो...
सब कुछ तो तुम्हारा है!
लिपट कर चिपक गया...
पसीने और आसुओं से सराबोर हो कर रुंधे गले से बोला...
मैं बुरी तरह फंस गया हूँ...
सारे कौरव इकट्ठे हो गए हैं...
मुझसे खेलने के लिए...
मुझे नौंचने के लिए....
मैंने ढाढस बंधाया की -
अब तुम बिहार में हो..
ये धरती -
बुद्ध, महावीर, अशोक जैसे विवेक शील प्रतापियों की जननी है..
अब यही "लोग" तुम्हारे पालनहार हैं..
इनकी सेवा करना ही तुम्हारी करनी है..
तो बिचारा लोकतंत्र बोला..
तुम दिल्ली जा रहे हो...
बोल देना -"नमो! " से की निराश न हों...
कोशिश जारी रखें...
जितनी फिरौती मांगे..
दे दें..
पर देश हित में मुझे बचा लें..
न यहाँ कोई बुद्धा हैं..
न महावीर और अशोक..
और न समाजवाद के प्रणेता जयप्रकाश नारायण....
इक सन्नाटा पसरा है...
एक अँध्यारा है...
इक खौफ और धमकी है...
आज देश के सारे "क्षत्रप" ऐसे इकट्ठे हो चियर्स कर रहे थे... मानों
महाभारत के युद्ध में... पांडवों को मोम के या लाख के महल में जलने को छोड़ दिया हो और
कौरव ठहाके लगा रहे हों...
विश्व विजय और पांडवों के अंत की! "
जैसे अभिमन्यु को रथ से गिरा कर...
कौरव ठहाके भरा अट्टाहास कर रहे थे.. वैसी ही -
मदांध हंसी....
मुझे आज सुनाई पड़ी है...
"नमो से मेरी इतनी सी पुकार बता देना की -
अपने बिहार को और अपने लोकतंत्र को भूल न जाएँ! "
"खंडहर में कुछ ही दिए हैं ; टूटे हुए से...
उन्हीं से काम चलायें...
इस दिवाली..
बहुत उदास थी -रात! "
(गर्वित गौरव!)
No comments:
Post a Comment