Wednesday, January 11, 2017

ज़िन्दगी -शब्दऔर प्रारब्ध!

ऐ ज़िन्दगी !
तू मुझे ले तो जा रही है.....
टेड़े मेढे रास्तों पर....
अपनी पूरी जदोजहद से पर-
यकीन नहीं होता कि-
ये तू ही है !

कल तक.......
नदी-पर्वतों  .......दूर गगन की छाँव की.....
बातें करने वाली ;ऐ रुखसार !
एक दम से  ....
तू इतनी बदल क्यों गई ;
मेरी हमनवां ?

कहाँ मुझसे गलती हो गई ?
जिसकी सजा  ...
इतनी बेहतरीन अदाओं के साथ  ...
मुझे परोस कर  ...
तू दे रही है ?

मुझे पता है कि -
मैं थोड़ा सा  ...
लिजलिजा सा इंसान हूँ।
न एकदम से बहुत तीखा और  ...
न शहद सा मीठा और  ...
शायद इसी कारण ;
मुझसे आलिंगन करने वाले लोग  ....
मुझमें न वो गर्मी पाते हैं और न वो कशिश,
जिसकी खोज में  ....
वे मुझे अपने बाहुपाश में बांधते हैं !

क्या करूँ ??
उस ऊपर वाले ने कुछ बनाया ही ऐसा है !
थोड़ा सनकी  ....
थोड़ा ठनकी  ....
बस कुछ कुछ ऐसा ही  ....
बेसिरपैर का  ..... बेवक़ूफ़  .... बदतमीज और
बेतकल्लुफी भरा एक नामाकूल इंसान !

मैंने भी सोच लिया है कि -
तू छका  .....
जितना छकाना हो ;
और मैं भी  ...
उतना ही चहकूँगा  .....
जितना तू छकाएगी !

मुझे पता है कि-
मेरी मन्ज़िल  ....
तेरे टेढ़े मेढ़े रास्तों से ही  ...
गुज़र कर जाती है क्योंकि;
मैं एक ऐसी शख्सियत का बेटा हूँ जिसने  ,,,
उसके हिस्से में मिले  ....
टेढ़े मेढ़े काँटों भरे रास्तों पर  ...
बिन माँ के हम दो भाइयों को भी  ....
गोदी में उठाया हुआ था।

चल  ....
दो दो हाँथ करते हैं और  ....
पंजा लड़ाते हैं।
तू अपना दांव लगा और  .... मैं अपना।
देखे ऊँट किस करवट बैठता है ?

मेरे पास मेरे शब्द और यकीन है तो  ...
तेरे पास मेरा प्रारब्ध।

मेरे शब्द और तेरे पास क़ैद मेरे प्रारब्ध के बीच हो जाए युद्ध।
देखे क्या होता है ;लिपिबद्ध !!!




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