रोज़ ढूंढता हूँ ...
अपने अंदर ...
रिश्तों की गर्माहट से ...
लदी रज़ाई और ...
उसे ओढ़ ...
सुबह से ही ...
निकल पड़ता हूँ ..
ज़िन्दगी को ...
ज़िंदा रखने की जुगत में ..
पंछियों की मानिंद ...
अपने दायरों के भीतर ...
सिमट कर !
भाईसाब नमस्ते !
दादा कैसे हैं ?
अरे !
कब ? कैसे हुआ ?
चलो कोई बात नहीं !
हमारे लायक कोई काम हो जरूर बताएं ?....और
आप चिंता न करें ;मैं हूँ न !
जैसे अपनत्व के शब्दों को ..
दिलासा की चादर में ...
लपेट कर ...
चल पड़ता हूँ ....
यूँ ही ....
निष्कपट और निरर्थक !
पता नहीं ..
ये रोज़ ...
सुबह सुबह से ..
सबंधों को ...
खाद और पानी देना और ..
रिश्तों की बागवानी करना ..
किसने सिखाया ?
बस लगता है कि -
पुरुष हूँ तो पौरुष होगा ही ?
ज़िंदा हूँ तो ज़मीर होगा ही ?
और दिल है तो ....
स्पंदन होगा ही ?
हाँ !इतना ज़रूर है कि अब ...
पौरुष,ज़मीर और स्पंदन भी ..
अपनी अपनी ...
मनगढ़ंत परिभाषाओं और ..
विवेचनाओं के दायरे में ..
सिमट कर ...
बदलने लगे हैं ...
अपने फलसफे !
मुझे क्या ?
मुझे तो पता है ;
अपना कद और प्रतिफल !
क्योंकि बस यही तो नियति है !
जो मेरे काले अध्याय हैं और जो मेरे हाथों रचित ..
कुनीति है ...
वही तो परिणिति है !
परिणिति से ..
पछतावा करना भी तो ...
मूर्खता है ?
क्योंकि ...
कभी वह भी तो ...
मेरी ही रचना और ..
मेरी ही प्रीति थी ?
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