शरद पूर्णिमा !!!
उन धड़कनों को ..
तहेदिल से सलाम ..
जो कभी ...
ज़िन्दगी की दौड़ में ...
मुझ चकोर की ...
चांदनी बनीं !
उन धड़कनों को -
"नज़राना सुकून का" ;
जिन्होंने कभी ..
चाँद सी शीतल बन ...
मुझे शीतलता दी !
उन कराहटों को -
दर्द भरी कराह ...
जिन्होंने -
वीरान रातों में ...
एकांकी कराह दी !
उन मासूम ,हसीन ...
चेहरों को -
"दस्तक दिल की" ;
जिन्होनें अपना ....
चाँद सा मुखड़ा ...
कुछ दूर तक ...
मुझे सौंपा ;
यूँ ही ...
साथ चलते चलते ...
गलबहियां करते ...
प्यारी सी बातें ....
बतियाने को !
उन बादलों को भी ..
भीना भीना सा सलाम ;
जो अक्सर ..
शरद पूर्णिमा की रात को ..
ढाँप लेते थे ,
हम जैसे ...
"चाँद और चकोर" को -
जिससे ..
हम ...
उस अँधेरी चाँदनीं के ..
दो पलों में -
दो ज़िन्दगानियां ...
गुज़ार लेते थे ;
बेखटके !
उन अँधेरी चांदनी रातों को ..
दर्द और सर्द का ...
मिलाजुला सलाम ..
जो ज़िन्दगी में आईं और ..
जिन्होनें दस्तक दी ..
मोहब्बत करने की !
उड़ता दोपट्टा...
सम्भाल कर ...
उढाने की जुर्रत करने की !
और
उड़ती जुल्फों को ...
अपनी उंगलियों की ...
कंघी से ...
संवार कर ...
सलीके से प्यार करने की !
आखिर में ...
उन रज़ाइयों को ..
उन तकियों को ..
उन चादरों को ..
और उन तन्हाईयों को ..
सिगरेट के धुओं के छल्लों सा ...
सलाम ...
जो गुज़र गईं ..
तुम्हारे इन्तिज़ार में ...
एक पूरी उम्र ...
कोरी कोरी ..
सूनी सूनी ....
और बासी बासी ....
के किसी शरद पूर्णिमा के दिन .....
पैदल चल कर ..
खुद मेरे मन के आँगन में ..
उतर आएगी ..
मेरी धवल चांदनी और
छा जायेगी -
मेरी ज़िन्दगी में ...
मोहब्बत की मिसाल बन !
पर ......?
सारी रात गुज़र गई ...
सैकड़ों पूर्णमासियां निकल गईं ...
तुम्हारा चकोर ...
आज भी इन्तिज़ार में है;
तुम्हारे मिलन के !
काश !!
मेरी ज़िन्दगी की खीर में ..
शरद की ...
इस पूरनमासी में ...
टपका देतीं तुम ...
अपनी एक बून्द शहद की ...
तो ...
संवर जाती ...
मेरी भी ज़िन्दगी और ...
अमर हो जाती ...
मेरी प्रेम कहानी !
काश !!
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