घर तो घर होते हैं ...
वे कभी दूर नहीं होते !
हाँ !ये अलग बात है कि -
ज़िन्दगी की दौड़ में ..
नए शहर और नए घरों में ...
वक़्त गुज़ारना पड़ता है !
हक़ीक़त में हम कभी उस घर को ..
भूलते ही नहीं ..
जहाँ कभी -
हम अपना बचपन छोड़ कर ..
जीवन समर में ..
आगे निकल आये !
माँ पापा या ...दादा दादी के ..
चारों और लहराती ..
छोटी छोटी बदमाशियां ...
तुलसीघरे के पास ..
माँ का ;
पूजा करता अक्स ...
बिजली की आंखमिचौली ..
और
माँ के पहलू में -सोने की जिद्द ;
ही तो -
वे उस बचपन के घर की ...
शास्वत दीवारें हैं ...
जो हम ..
ताउम्र सँजोये रहते हैं ...
सात समुन्दर पार भी !
एक हिंदुस्तानी ..
जब बाहर जाता है तो -
अपना सब कुछ ..
यहीं छोड़ जाता है ;
लेकिन
अपने घर को ...
जरूर ले जाता है ...
परदेश में ; और
फिर उस -
परदेशी नए घर को भी ...
वो सजाने की कोशिश ...
शुरू कर देता है ...
बिलकुल पुराने घर जैसा !
माँ पापा की फोटो ..
कहाँ लगेगी ?
गणेश जी कहाँ विराजेंगे ?
कुल देवी / देवता की फोटो
कहाँ लगानी है ? और
बगीचे में कौन सा फूल लगाना है ?
जैसी -
बड़ी बड़ी से छोटी छोटी- बातें ...
तय कर देती हैं ..
एक हिंदुस्तानी की नींव ..
और उसकी बुलंदी !
हक़ीक़त में -
एक हिंदुस्तानी ...
चाहे संसार के ...
जिस कोनें में बस जाए ..
उसका हिंदुस्तानी वास्तुविद ....
और ज़िन्दगी में -
एक अदद घर ....
बसाने की "फ़िलॉसफ़ी"
कभी भी ख़त्म नहीं होती !
हाँ !इतना जरूर है कि -
इस कश्मकश भरी दौड़ में ...
पूज्य माँ पापा को ...
चाहे जितने ..
अच्छे घर में रखो ...
जब कभी भी ....
घर की बात चलेगी तो
बरबस उन्हें
अपने हिंदुस्तान के ...
गाँव की याद आ जायेगी !
चलो दिवाली आ रही है ...
वे घर के गलियारे और बरामदे ...
तुम्हारी बाट जोह रहे है!
उन घरों के ..
कुछ वाशिंदे थे ...
जो अपना सफर पूरा कर ..
जा चुके हैं !
चलो इस दीपावली ..
हम सभी ..
अपनी जड़ों की तरफ ..
चलते हैं !
बचपन के घर की -
दीवारें ,देहरियां और आहते ...
इन्तिज़ार कर रहे हैं ...
अपने वारिसों की ...
कि वे कभी -
दिवाली में आएंगे और ...
प्रकाश के दिए जलाएंगे !
यही ज़िन्दगी है ...
रफ्ता रफ्ता ...
चलती जा रही है ...
सिगरेट की मानिंद ..
सुलगते सुलगते ...
राख बनने की दौड़ में !
चलो राख बनने से पहले ..
अपने गुमे हुए ..
बचपन के घर को ..
हल्का फुल्का ..
सवाँर लें !
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