बेहतरीन तरीके से जनपद की दुकानों की नीलामी हो गई। जनपद पंचायत को लगभग ८० लाख रुपए मिल गए। देखना यह है कि इस नीलामी से और इन दुकानों को लेने वाले सम्मानित ग्राहकों को क्या मिलता है ?
सात लाख से १२ लाख रुपए के बीच खरीदी गई इन दुकानों से ऐसा क्या व्यापार और मुनाफा कमा लेंगे अपने लवकुशनगर के भाई बंधु; यह यह चिंता का विषय है !
कोई बोली बढ़ाता जाएगा और बोली बढ़ती जायेगी .... जैसी सोचों से हम किधर जा रहे हैं ?
कितना दायरा और 'स्कोप' है हमारे लवकुशनगर का ? इस बारे में चिंतन करने का वक़्त आ गया है !
पूंजीवाद का फंडा होता है कि -"अमीर ;अमीर होता जाता है और गरीब; गरीब ... !" कुछ कुछ ऐसा ही हमारे लवकुशनगर में भी हो रहा है !
सामाजिक वर्जनाओं के ताने बाने में जनपद पंचायत की यह दुकानें कौन सा धंधा अपने भाइयों का सफल कर देंगी ;यह शोध का विषय है ?
महोबा मार्ग पर बनीं यह दुकानें जब अपने चरम पर सजेंगी और फलेंगी-फूलेंगी तब यह हमारी बदलती सोच और विकास का आइना होंगीं !
चूँकि यह स्कूल मार्ग है और अधिकांशतः बच्चे इसी मार्ग से गुज़रते हैं अथवा इन दुकानों के सामने स्थापित शासकीय विद्यालयों में पढ़ते भी हैं तो इन दुकानों में खुलने वाले प्रतिष्ठानों से लवकुशनगर का नज़रिया और विकासपरख दृष्टिकोण भी परिभाषित होगा !
अब जब हमारे तहसील के एसडीएम ,तहसीलदार ,सीईओ एवम प्राचार्य महोदय रोज़ाना इस लवकुशनगर की सिविल लाइन्स वाली सड़क से गुज़रेंगे तो इस तथ्य पर तो अवश्य नज़र रखेंगे कि -इन दुकानों का व्यापारिक दृष्टिकोण क्या है अथवा होना चाहिए ?
काश !कभी यह भी तय होता कि -चूँकि सामने विद्यालयों की भरमार है तो -
एक दूकान स्टेशनरी के लिए आरक्षित है तो
एक दूकान कंप्यूटर सेण्टर खोलने के लिए !
कोई दूकान जनपद पंचायत अपने किसी सरपंच को दे देती तो
कोई दूकान रिटायर्ड शासकीय कर्मचारी को !
लेकिन यह सब तो हमारी कपोल कल्पना एवम सोच है जो ...
'काश' शब्द से शुरू हो कर 'काश' शब्द पर ही ख़त्म हो जाती है।
लेकिन इतना जरूर है कि -दुकानें चाहे जितने में हमनें या हमारे भाई बंधुओं ने खरीद ली हों लेकिन यह मुनाफे और समझदारी भरा फैसला कतई नहीं लगता क्योंकि -
"सबकुछ गवां के होश में आये तो क्या किया ?"
"रोज़ मर जाती है मेरे सामने की एक नदी और रोज़ उसके उद्धार की एक गूँज सुनाई देती है !"
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