"आज खूब रंग बदले; मैंने !!
कभी हरा ...
तो कभी पीला ...
तो कभी लाल हुआ ;मैं !!
श्यामल,स्याह और गुलाल हुआ; मैं !!
लेकिन ; फिर ...
शाम बीतते बीतते ....
रंग उतरते ही ...
बेहाल हुआ ;मैं !!
नंगा और फटेहाल हुआ; मैं !!
एक दिन को ही सही ..
शीशे के आगे ..
भूल जाता हूँ ;
सारे दर्द ...क्योंकि -
पहचान नहीं पाता हूँ ..
बदले हुए रंगीन ...
अक्स के बीच ...
अपना सर्द मर्ज !!
शीशे के आगे ..
भूल जाता हूँ ;
सारे दर्द ...क्योंकि -
पहचान नहीं पाता हूँ ..
बदले हुए रंगीन ...
अक्स के बीच ...
अपना सर्द मर्ज !!
क्या करूँ ??
ये रंग ...
छुपा देते हैं ...
हर दर्द और उसके पीछे का ...
अकेला तन्हा खुद्दार मर्द !!
ये रंग ...
छुपा देते हैं ...
हर दर्द और उसके पीछे का ...
अकेला तन्हा खुद्दार मर्द !!
काश !
ये ज़िन्दगी भी ...
होली के रंगों के मानिंद ..
चटकीली होती !
हम लगा कर ...
रंगों के मुखौटे और ....
अपनी तस्वीर ...
कोशिश करते ...
बदलने की ...
अपनी फूटी तक़दीर !!"
ये ज़िन्दगी भी ...
होली के रंगों के मानिंद ..
चटकीली होती !
हम लगा कर ...
रंगों के मुखौटे और ....
अपनी तस्वीर ...
कोशिश करते ...
बदलने की ...
अपनी फूटी तक़दीर !!"
Garvit Gaurav!!
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