Friday, March 24, 2017

ख्वाबगाह की दरकार!


किसी को बड़ा सा घर चाहिए जहां ज़िन्दगी की भाग दौड़ के बीच ..
सारी खुशियां मिल सकें ! तो ...
किसी को घने जंगलों के बीच इक छोटी सी झोपड़ीनुमा कुटिया चाहिए ...
जहां ज़िन्दगी की अफरा तफरी के बीच ...
थोड़ी सी खुशियां मिल सके !
वाह री ज़िन्दगी !
क्या दस्तूर हैं तेरे!
किसी को जंगलों में चाह है ;मोहब्बत की तो ...
किसी को महलों की दरकार है !
शौक अपने अपने तो
चाह भी अपनी अपनी !
आदमी आदमी है और
इंसान इंसान !
फर्क थोड़ी सा है ..
"कोई गलतफहमियों के दायरों में है तो कोई हक़ीक़त की पगडंडियों में !!"

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