Tuesday, March 21, 2017

मोहपाश के धागे और हम !

तृप्त आत्माओं सा ...
बनना पड़ेगा ...
इस जीवन उपवन के ...
दर्शन में ;
वर्ना
निरर्थक हो जाएगा ...
प्रसंग तुम्हारा ...
यदि रहे तुम ..
प्रेमपाश के बन्धन में !

मोहपाश में पड़कर ...
तुमको....
सिर्फ यहां ...
अपमान मिलेगा !
बदनामी और लज्जा रूपी .. 
किंचित मोह का ज्ञान मिलेगा !

वहीँ अगर तुम ;
आसक्ति और प्रेमपाश का त्याग करोगे ...
यकीनन सम्मान मिलेगा !
मर्यादा और पवित्रता का .. 
सार्थक रसपान मिलेगा !

बंधु !
यह जीवन ...
ऐसा ही है !
"लघु है ..
तो कहीं लम्बा !
लस्सी है ....
तो कहीं मट्ठा !"

"कभी तिरस्कृत कभी पुरुस्कृत !"
कभी अनावृत कभी चर्चित !
कभी प्रसंशित कभी शापित !

इस जीवन के महासफर में  ...
सिर्फ वही है ...
हर्षित और स्पंदित ;
जिसने खोले ज्ञान चक्षु और 
सौन्दर्य बोध को किया तिरोहित !

हाँ ! इतना है ; अवश्य .. 
अपमानित हो कर ही तुम ; 
सौन्दर्य विवश ...
छलका पाओगे ;
मधुशाला जैसे ...
अमृत कलश !

(गर्वित गौरव !)


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