अब जो कुछ है -यथार्थ है !
निज स्वार्थ है !
नित रोज ..
बदलते चेहरे देख रहा हूँ ..
कुछ अपनों के ...
तो कुछ ..खुद के भी !
उन चेहरों के बीच ...
कोशिश करता हूँ ...
हँसने की या हंसाने की ..
क्योंकि ..
आज कल -
हंसते हुए चेहरे ...
बमुश्किल देखने को ...
मिलते हैं !
खौलता कश्मीर ..
खोखली कांग्रेस ..
खिसियाता सवर्ण ..
और
खामोश हिंदुस्तानी ...
हर तरफ दिख जाएंगे ..
परंतु
खिलखिलाता युवा मन ..
खिलखिलाता बचपन ...
और
खिलखिलाता यौवन ...
नहीं दिखेंगे !
तो चलो !
अकेले में ..
मोबाइल के कैमरे के सामने ही ...
खिलखिला लें ...
कुछ पलों के लिए ...
अपनी खोखली हंसी के साथ !"
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