Sunday, August 21, 2016

गाय !गऊ ! या आवारा पशु ! कहानी एक नस्ल का नाम बदलने की !

देर रात -
घर के बाहर बैठीं गायें ..
ताकती हैं मेरे दरवाज़े को ...
रोज़ जूठन की रोटी की
आस में ...
कि शायद .....
मकान मालिक को ...
आ जाए कुछ दया और ..
"गऊ माता" समझ कर ...
शायद फेंक दे ...
दो चार जूँठन की "बची खुची" रोटियां और
इस पॉलीथिन और गत्ते से भरे पेट में ...
अन्न के कुछ दाने
ही पहुँच जाएँ !

रोज़ रात -
घर का ताला ..
लगाने जाते हुए ...
जब देखता हूँ ...
इन प्राणियों को ..
देखते हुए ...
अपना दरवाज़ा तो
अपराध बोध से ...
ग्रसित थके कदमों से ...
लौट आता हूँ ...
अपने कमरे में और -
हाँथ फेरता हूँ ...
अपने सोते बच्चों पर ...
पर तभी -
आँखों में कोंध जाती हैं ...
घर के बाहर ..
रोटी की आस में बैठी ...
गाय और उसके बछड़े !

काश! होता कोई सिस्टम जहाँ -
ई मेल कर देता ऊपर वाले को कि -
कुछ नहीं कर सकते तो ..
कम से कम ...
इन बेसहारा गायों के -
पेट की ..
लम्बाई चौड़ाई तो ...
कम कर दो ...
जिससे भूंख
जल्दी शांत हो जाया करे ...
इन निरीह प्राणियों की !
और हमें भी ...
गाए की राजनीति से ..
मुक्ति मिल जाए !

अब तो ...
कोई भी परीक्षा में ..
कई बरस से -
छोटी कक्षा के ...
हिंदी के पेपर में -
"गौमाता" पर निबंध भी नहीं आता !

लगता है जैसे कि -
"सरकारों "ने रोक दिया है  ..
अध्यापकों को कि -'गौमाता" पर निबंध न दिया करें !
वरना -
अराजकता का माहौल बन सकता है !

धीरे धीरे भूलने लगे हैं हम ... -"गाये" को "गऊ माता" बोलना या फिर "बछड़े" को "नन्दी" बोलना !

बहुत तेज़ी से ..बदल रहे हैं हम ..
अपना शब्दकोश ...
और
दोस्तों के बीच ..
हम खुद अपने बाबूजी या पिताजी या पापा को
बोलने लगे हैं -
"डुकर या डैड या बूढ़े आदमीं/ओल्ड मैन "
तो फिर "गाये" जैसी -
आवारा चरने वाली ...
धरती की बोझ को हम कैसे -
"गऊ माता" बोल कर
अपने आधुनिक शब्दकोश की
डिक्शनरी के पन्ने भारी करें ?

कम से कम ..कुछ नहीं तो ...
सरकारें -सी.आर.एस सिस्टम -
(काऊ रिजर्वेशन सिस्टम) ही लागू कर दें -
तो शायद
गाये नस्ल को पुनः
बीता  स्वर्णम काल
नसीब हो जाए !

ज्यादा कुछ नहीं -
बस जिनके -आधार कार्ड में सी.आर.एस.चढ़ा होगा ...
उन्हें सरकारी नौकरियों में ५% आरक्षण का
प्रावधान होगा !

शायद ...
आरक्षण के चक्कर में .....
लोगबाग फिर से -
"गाये" को "गऊ माता" कह
उसकी कदर करने लगें !

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