एक मकान मालिक सी गुज़र गई ज़िन्दगी ..
लोग मिले ..
कुछ दिन "दिल" में ठहरे ...
और बिना "किराया" चुकाए चलते बने !
जब जब "किराया" चुकाने की बारी आई ..
और मैंने उनकी "आँखों" में झांक कर किराए के रूप में अपने को तलाशा ...
उन्होंने "मकान" खाली कर दिया !
जब "घर" में कदम रखा था तो -
"सात जन्मों" से "सात फेरों" तक ...
साथ देने की शर्तें ...
आसानी से मानते थे लोग !
और जरा सी हवा क्या लगी शहर की ...
मैं और मेरा "नाज़ुक घर" दुत्कार दिया गया कोई इल्ज़ाम लगा कर !
दुःख ....
किराया न मिलने का नहीं है .....बल्कि
दुःख ...
इस बात का है कि -"इतने गज़ब" किरायेदारों के साथ चलते चलते ...
बिचारे घर की हालत बहुत जर्जर हो गई है ...
खिड़की दरवाज़े और दीवारों पर ....
खोद खोद कर ....
भाई लोगों ने गोद दिए हैं ... अपने नाम और पते !
अब चाहे जितनी पुताई या पोलिश करवाओ ..
कमबख्त "निशाँ" नहीं मिटते ....
और नए किरायेदार तो अब दूर से ही मुस्करा कर निकल जाते हैं ...
पतली गली से !
इतनी आंधी बारिशें और तूफान ...
झेल चुका हैं ये ....
"खंडित खंडहर" कि अब ... लगता है कि -
"खता और खफा ' समझने में गुज़र गयी "ज़िन्दगी" और मैं खड़ा रह गया उस "किरायेदार" की खोज और इन्तिज़ार में जो कभी नहीं आया !
और अंतिम प्रहर में "वो" जो आया भी तो गंगाजल की भांति आया ...
छिड़क कर अपनी "गंगाजली बूंदें " ....
कर दिया उसने ...
"पावन और पवित्र" उस ...
अंतर्मन को जिसे देख कर लोग "हंस" ....
कर आगे बढ़ जाते थे !
अंतिम किरायेदार ! भी उस "मिटटी के दिए" की भाँती आया कि -....
जिसने "सोख" लिये अपनी दीवारों में मेरे सारे "रन्जो गम" और बना दिया मेरे जर्जर मन को मज़बूत किला !
No comments:
Post a Comment