आज पुराने बक्से को खंगालते हुए... मिल गई वो तकिया...
जिसको बीस बरस पहले...
अक्सर मैं अपनी -
ख्वाबगाह...
कहा करता था!
तसल्ली से....
निकालता था......
अपना दुःख... और
सुकून से बंटाता था..
अपना सुख....
उसको ;
गुड-मुड़ा कर...
या
भिगो कर...
तेरी विरह की यादों के....
समंदर के...
आंसुओं से......या...
तेरे मिलने के...
सतरंगी सपनों के...
सीलबंद लिफाफों से!
हाथ में लिए ये बख्तरबंद तकिए को...
सोच रहा हूँ की -
आह ज़िन्दगी!
बीस बरसों में..
वक़्त की करवट में...
तेरे मेरे दरम्या...
उपजे मोहब्बतों के....
निशानात....
तो उड़ गए....
पर कमबख्त...
इस तकिए से....
वो आंसूं न धूल पाये....
जो आज भी.....
खामोशी से........
गवाह बने हुए हैं....
अपने अधूरे...
ख्वाबगाह के! "
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