"जब तूने कहा कि -
"मुझे भूल जाना और फिर कभी
यहां न आना ...
न याद करना ...
न याद आना ...
तो उस जवां होती ...
बीस बरस की उम्र में ..
मुझे याद आये ....
अमिताभ-रेखा के ...
वे नग्मे ...
जिसमें वे कहते हैं कि -
"तुम होती तो ऐसा होता ...
तुम होती तो वैसा होता !"
गुरुदत्त साहिब जैसा ...
उड़ा उड़ा सा ...
अपने आप को महसूस करता हुआ ...
पहुंचा भोपाल के ....
बस अड्डे पर ...
और बैठ गया -
"भोपाल से झाँसी"
बस में ...
फिर कभी लौट कर ...
भोपाल न आने की ..
सोच कर !"
चलती बस की ...
अंतिम सीट पर बैठ कर ...
बड़ी हिम्मत से ...
ज़िन्दगी में पहली बार ...
पान की दूकान से ...
खरीदी गई सिगरेट को ...
माचिस से ...
जलाने की कोशिश की ...
लेकिन ....
अनाड़ी हाथों से ...
वह सिगरेट ...
तीसरी बार में सुलग पाई !
मैंने "नर्वस नर्वस" से ...
"बुझे बुझे" मन से ....
ज़िन्दगी में ...
सिगरेट का पहला कश ...
तुझे भूलने की खातिर ...
लिया !
जेहन में -
देव साहिब का ...
वो गाना भी ...
गूंज रहा था कि -
"हर जख्म को धुएं में उड़ाता चला गया !"
एक कश ....
दूसरा कश ...
लेने के बाद भी ...
कोई भी जुदाई की फीलिंग ...
कम नहीं हुई ...
कोई भी जख्म धुएं में नहीं उड़ा !
फिर सोचा कि -
शायद कुछ गहरी सांस से ..
कश लेना पड़ता होगा ..
तभी दर्द ...
कम होता होगा ...
और फिर लिया ...
ज़िन्दगी में सिगरेट का ...
अंतिम कश ...
बहुत गहरा ...
बहुत लम्बा ...
बहुत अंदर तक ...
फिर धुंआ भी ...
छल्ले बना बना कर ...
गुरुदत्त साहिब जैसा ...
मुंह से निकाला ...
लेकिन ;
तेरी मोहब्बत ...
तेरी यादें ....
कसमें वादे ...
कम न होकर ..
कुछ ज्यादा ही भड़क गए ...
कभी न मिटने के लिए !
उस अंतिम सिगरेट और ...
उसकी धुएं की धुंध में ....
कुछ ऐसी कशिश थी ..
और उस वाक़िये ने ..
कुछ ऐसी -
अमिट छाप छोड़ी ...
की आज ..
पच्चीस साल बाद भी ...
तेरी यादों की खिचड़ी ...
मेरे दिल की भट्टी में ...
पक रही है ..
और मैं ;
अपनी सफ़ेद होती दाढ़ी के साथ ...
कोशिश में लगा हुआ हूँ ...
की कहीं वो ...
दो दशकों से पक रही खिचड़ी ...
गलती से अपनी ...
भीनी भीनी सी खुशबू ..
न महका दे और
न चाहते हुए भी ...
बदनाम हो जाए ..?
हमारी भूली बिसरी ..
दीवानगी और
दो जिंदगानियों की ....
जमींदोज़ जदोजहद !"
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